Tuesday, November 9, 2010
pakistan
हम डरते नहीं एटम बम्ब, विस्फोटक जलपोतो से
हम डरते है ताशकंद और शिमला जैसे समझोतों से
सियार भेडिए से डर सकती सिंहो की औलाद नहीं
भरत वंश के इस पानी की है तुमको पहचान नहीं
भीख में लेकर एटम बम्ब को तुम किस बात पे फूल गए
६५, ७१ और ९९ के युधो को शायद तुम भूल गए
तुम याद करो खेतरपाल ने पेटन टैंक जला डाला
गुरु गोबिंद के बाज शेखो ने अमरीकी जेट उड़ा डाला
तुम याद करो गाजी का बेडा एक झटके में ही डूबा दिया
ढाका के जनरल नियाजी को दुद्ध छटी को पिला दिया
तुम याद करो उन ९०००० बंदी पाक जवानो को
तुम याद करो शिमला समझोता और भारत के एहसानों को
पाकिस्तान ये कान खोलकर सुन ले
की अबके जंग छिड़ी तो सुन ले
नमो निशान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा
लाल कर दिया तुमने लहू से श्रीनगर की घाटी को
किस गफलत में छेड़ रहे तुम सोई हल्दी घाटी को
जहर पिला कर मजहब का इन कश्मीरी परवानो को
भय और लालच दिखला कर भेज रहे तुम नादानों को
खुले पर्शिक्षण है खुले शस्त्र है, खुली हुई नादानी है
सारी दुनिया जान चुकी ये हरकत पाकिस्तानी है
बहुत हो चुकी मक्कारी, बस बहुत हो चूका हस्ताक्षेप
समझा दो उनका वरना भभक उठे गा पूरा देश
हिन्दू अगर हो गया खड़ा तो त्राहि त्राहि मच जाएगी
पाकिस्तान के हर कोने में महाप्रलय आजायेगी
क्या होगा अंजाम तुम्हे इसका अनुमान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा
ये मिसाइल ये एटम बम्ब पर हिम्मत कोन दिखायगा
इन्हें चलाने जन्नत से क्या बाप तुम्हारा आएगा
अबकी चिंता मत कर चहरे का खोल बदल देंगे
इतिहास की क्या हस्ती है सारा भूगोल बदल देंगे
धारा हर मोड़ बदल कर लाहौर से निकलेगी गंगा
इस्लामाबाद की छाती पर लहराएगा तिरंगा
रावलपिंडी और करांची तक सब गारत हो जाएगा
सिन्धु नदी के आर पार सब भारत हो जाएगा
फिर सदियों सदियों तक जिन्नाह जैसा शेतान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा
हिन्दू-स्थान ने ली अब एक नई अंगड़ाई है
भारत माँ के चरणों में ये सोगंध हमने खायी है
आज नहीं तो कल हम अखंड भारत बनायेंगे
सिन्धु को फिर दुबारा गंगा से मिलाएँगे
बंग भंग हुआ था, पाप एक इस धरती पर
दुर्गा की भूमि को पुनः आजाद कराएँगे
खैबर पास और हिन्दुकुश भारत की सीमा होगी
चंहु ओर सनातन और केसरिये की जय जय कर होगी
ये स्वपन एक दिन जरुर साकार होगा
पर उस दिन कश्मीर तो होगा लेकिन
पकिस्तान नहीं होगा
। । भारत माता की जय। ।
। । अखंड भारत की जय। ।
Sunday, October 31, 2010
Thursday, October 28, 2010
मेरे बीवी खड़ी सामने आँखों में भर के जोश !
बोली मिस्टर कैसे हो और कैसी कटी है आपकी रात ,
ना जाने क्यों कर रही थे मिश्री से मीठी बात !
मैंने पूछा ओ डियर आज मैं तुमको क्यो भाया ,
पलकें झुकए बड़ी शर्म से बोली करवाचौथ है आया !
ये सुन कर मेरे शरीर मैं दौड़ उठा करेंट ,
समझ गया था मेरे नाम का निकल चुका वारेंट!
इस दिन का इंतजार हर शौहर को है रहता ,
बड़ी अदब से बात मनती मैं जैसा-जैसा कहता !
पूरा साल बीत गया था सुन -सुन के ताने ,
आज कहे हर बात पे हाँ , ये मेरी ही माने !
मुझे कभी परमेश्वर कहती कभी कहे देव ,
खुद तो व्रत रखती पर मुझको देती सेब !
शाम होते होते फिर वो घड़ी है आती ,
गिफ्ट गिफ्ट का राग आलापे बाज़ार ले जाती !
अहसानों के बोझ तले दब मुझ को आए रोना ,
नहीं चाहते हुए भी लेना पड़े है महँगा सोना !
देर रत जब चाँद ना निकले ये चाँद -चाँद चिल्लाए ,
कभी भेजे नुक्कड़ पे मुझको कभी छत पे दौड़ाए !
मैं भी जब दौड़- दौड़ के हो जाता परेशान ,
हाथ जोड़ कर चाँद से बोलूं अब बात इसकी मान !
आज तुम्हारा दिन है इसलिए खा रहे भाव ,
कल से कौन पूछेगा तुम को जब आओ जब जाव !
इतनी से बात क्यों मैडम के समझ ना आती ,
जो साल भर प्यार जताती तो बात बन जाती !
Monday, October 25, 2010
मैं बहुत बोलता हूं
धारदार पैने शब्दों के तीर छोड़ता हूं।
ऐसा नहीं कि मित्रों, मुझको इतना ज्ञान नहीं,
बहुत बोलना किसी विद्वता की पहचान नहीं।
पर जब अन्याय, अनीति का जोर देखता हूं,
अपने चारों ओर चोर ही चोर देखता हूं।
चुप बैठकर रहूं देखता, यह स्वीकार नहीं,
कायर ही अन्याय का करते प्रतिकार नहीं।
दरबारों का गीत मुझको नहीं सुहाता है,
मुझको तो बस खरी बात कहना ही आता है।
कोई क्या कहता है, इसकी परवाह नहीं,
बुद्धिमान कहलाऊं ऐसी मुझको चाह नहीं।
झूठ को सच कहने का मुझको हुनर नहीं आता
दिल में जलती आग हो तो चुप रहा नहीं जाता।
हूं तो अकेला चना, मगर मैं आँख फोड़ता हूं,
यह सच है मित्रों कि मैं बहुत बोलता हूं।
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Tuesday, October 19, 2010
sharm proof
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
जो तिरंगा है देश का मेरे, जिसको हमने स्वयं बनाया था;
हिन्दू हित की कटौती करने को, 3 रंगों से वो सजाया था;
जिसकी रक्षा को प्राणों से बड़ा मान, सेना दे देती बलिदान;
उस झण्डे को जलाते जो, और करते हों उसका अपमान;
शर्मनिरपेक्ष बने वोटों के कारण, साथ ऐसों का दिया करते हैं;
मानवता का दम भरते हैं, क्यों फिर भी शर्म नहीं आती?
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष....कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
वो देश को आग लगाते हैं, हम उनपे खज़ाना लुटाते हैं;
वो खून की नदियाँ बहाते हैं, हम उन्हें बचाने आते हैं;
वो सेना पर गुर्राते हैं, हम सेना को अपराधी बताते हैं;
वो स्वर्ग को नरक बनाते हैं, हम उनका स्वर्ग बसाते हैं;
उनके अपराधों की सजा को,रोक क़े हम दिखलाते हैं;
अपने इस देश द्रोह पर भी, हमको है शर्म नहीं आती!
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष...कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
इन आतंकी व जिहादों पर हम गाँधी के बन्दर बन जाते;
कोई इन पर आँच नहीं आए, हम खून का रंग हैं बतलाते;
(सबके खून का रंग लाल है इनको मत मारो)
अपराधी इन्हें बताने पर, अपराधी का कोई धर्म नहीं होता;
रंग यदि आतंक का है, भगवा रंग बताने में हमको संकोच नहीं होता;
अपराधी को मासूम बताके, राष्ट्र भक्तों को अपराधी;
अपने ऐसे दुष्कर्मों पर, क्यों शर्म नहीं मुझको आती;
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष....कारनामे घृणित हों कितने भी, शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
47 में उसने जो माँगा वह देकर भी, अब क्या देना बाकि है?
देश के सब संसाधन पर उनका अधिकार, अब भी बाकि है;
टेक्स हमसे लेकर हज उनको करवाते, धर्म यात्रा टेक्स अब भी बाकि है;
पूरे देश के खून से पाला जिस कश्मीर को 60 वर्ष;
थाली में सजा कर उनको अर्पित करना अब भी बाकि है;
फिर भी मैं देश भक्त हूँ, यह कहते शर्म मुझको मगर नहीं आती!
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष...कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
यह तो काले कारनामों का,एक बिंदु ही है दिखलाया;
शर्मनिरपेक्षता के नाम पर कैसे है देश को भरमाया?
यह बतलाना अभी शेष है, अभी हमने कहाँ है बतलाया?
हमारा राष्ट्र वाद और वसुधैव कुटुम्बकम एक ही थे;
फिर ये सेकुलरवाद का मुखौटा क्यों है बनवाया?
क्या है चालबाजी, यह अब भी तुमको समझ नहीं आती ?
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष...कारनामे घृणित हों कितने भी,शर्म फिर भी मुझे नहीं आती !
मैं हूँ एक शर्मनिरपेक्ष, शर्म मुझको तभी नहीं आती !! शर्म मुझको तभी नहीं आती !!
Saturday, October 2, 2010
डॉ. हरिओम पंवार
अधिकारों की खत्म कहानी है
जहाँ साँस लेने में भी आपत्ती होती हो
छुप-छुप कर रोने पर भी जब पहरे बैठे हों
न्यायालय के आँगन में भी बहरे बैठे हों
जब कोई अधिकार नहीं होता हो सपनों का
जब कोई विश्वास नहीं होता हो अपनों का
जब कोई इन ओठों का हिलना भी बंद करे
माँ का अपने बच्चों से मिलना भी बंद करे
एक अपाहिज जो लेकर बैसाखी चलता हो
एक दिया जो आँचल की छाया में पलता हो
जब सूरज होने के भ्रम में दीपक ऐंठा हो
राजमहल का आँचल सर पे डाले बैठा हो
नदिया का तिनका भी खुद को बांध समझ ले जब
कोई जुगनू भी खुद को चाँद समझ ले जब
तब भी यदि समझौता करती हुयी जवानी है
तो फिर अधिकारों की समझो खत्म कहानी है
घाटी के दिल की धड़कन
डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था
काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था
काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था
काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में
ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है
गंधों के घर बंदूकों का मेला है
मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ
आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ
मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ
आजादी की पीड़ा का उच्चारण हूँ
इसीलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
छू कर तो देखो हिम छोटी के नीचे अंगारा है
दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल हटाकर दर्पण की
दरबारों की तस्वीरें भी हैं बेशर्म समर्पण की
काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केसर की क्यारी में
काश्मीर है जहाँ रुदन है बच्चों की किलकारी में
काश्मीर है जहाँ तिरंगे झण्डे फाड़े जाते हैं
सैंतालिस के बंटवारे के घाव उघाड़े जाते हैं
काश्मीर है जहाँ हौसलों के दिल तोड़े जाते हैं
खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते हैं
अपहरणों की रोज कहानी होती है
धरती मैया पानी-पानी होती है
झेलम की लहरें भी आँसू लगती हैं
गजलों की बहरें भी आँसू लगती हैं
मैं आँखों के पानी को अंगार बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
झरनों का पानी रक्तिम है झीलों में अंगारे हैं
काश्मीर है जहाँ फिजाएँ घायल दिखती रहती हैं
जहाँ राशिफल घाटी का संगीने लिखती रहती हैं
काश्मीर है जहाँ विदेशी समीकरण गहराते हैं
गैरों के झण्डे भारत की धरती पर लहरातें हैं
काश्मीर है जहाँ देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहाँ तीन सौ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहाँ दरिंदों की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छप्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहाँ हमारा राष्ट्रगान शर्मिंदा है
भारत माँ को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहाँ देश का शीश झुकाया जाता है
मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है
गूंगा-बहरापन ओढ़े सिंहासन है
लूले - लंगड़े संकल्पों का शासन है
फूलों का आँगन लाशों की मंडी है
अनुशासन का पूरा दौर शिखंडी है
मै इस कोढ़ी कायरता की लाश उठाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर
वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बँटवारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फिर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अँधियारों का
कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की
कुलवंती दासी हो गई रखैलों की
घाटी आँगन हो गई ख़ूनी खेलों की
आज जरुरत है सरदार पटेलों की
मैं घाटी के आँसू का संत्रास मिटाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
भारत माँ की मर्यादा के मंदिर खंडित होते हों
जब क्रश भारत के नारे हों गुलमर्गा की गलियों में
शिमला-समझौता जलता हो बंदूकों की नालियों में
अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिन की मोहलत दे दे तैय्यारी की
सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी
जिनको भारत की धरती ना भाती हो
भारत के झंडों से बदबू आती हो
जिन लोगों ने माँ का आँचल फाड़ा हो
दूध भरे सीने में चाकू गाड़ा हो
मैं उनको चौराहों पर फाँसी चढ़वाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
चाँद-सितारे टांक लिये हैं खून लिपि दीवारों ने
इसीलियें नाकाम रही हैं कोशिश सभी उजालों की
क्योंकि ये सब कठपुतली हैं रावलपिंडी वालों की
अंतिम एक चुनौती दे दो सीमा पर पड़ोसी को
गीदड़ कायरता ना समझे सिंहो की ख़ामोशी को
हमको अपने खट्टे-मीठे बोल बदलना आता है
हमको अब भी दुनिया का भूगोल बदलना आता है
दुनिया के सरपंच हमारे थानेदार नहीं लगते
भारत की प्रभुसत्ता के वो ठेकेदार नहीं लगते
तीर अगर हम तनी कमानों वाले अपने छोड़ेंगे
जैसे ढाका तोड़ दिया लौहार-कराची तोड़ेंगे
आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से
क्या डरना अमरीका के आकाओं से
अपने भारत के बाजू बलवान करो
पाँच नहीं सौ एटम बम निर्माण करो
मै भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन निकला हूँ ||
विमान-अपहरण
दरबारों के लिये कभी अभिनन्दन-गीत नहीं गाता
गौण भले हो जाऊँ लेकिन मौन नहीं हो सकता मैं
पुत्र- मोह में शस्त्र त्याग कर द्रोण नहीं हो सकता मैं
कितने भी पहरे बैठा दो मेरी क्रुद्ध निगाहों पर
मैं दिल्ली से बात करूँगा भीड़ भरे चौरोहों पर
दिल्ली को कोई आतंकी जादू- टोना लगता है
गीता-रामायण का भारत बौना -बौना लगता है
विस्फोटों की अपहरणों की स्वर्णमयी आजादी है
रोज गौडसे की गोली के आगे कोई गाँधी है
मैनें भू पर रश्मिरथी का घोड़ा रुकते देखा है
पाँच तमंचों के आगे दिल्ली को झुकते देखा है
हम पूरी दुनिया में बेचारे- से हैं
अपमानों की ठोकर के मारे- से हैं
मजबूरी संसद की सीरत लगती है
अमरीका की चौखट तीरथ लगती है
मैं दिनकर का वंशज दिल्ली को दर्पण दिखलाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ
जब भारत का यान खड़ा था कंधारों की धरती पर
असमंजसता बनी हुई थी भारतीयों की मुक्ति पर
भीम छुपाकर मुँह बैठे थे बेशर्मी के दामन में
अर्जुन का गांडीव पड़ा था कायरता के आँगन में
रावन अट्टहास करता था पंचवटी की राहों में
राम घिरे लाचार खड़े थे गठबंधन की बाँहों में
हम हमदर्दी खोज रहे थे काबुल वाले गैरों में
हमने टोपी जाकर रख दी अफगानों के पैरों में
जो अफगानी आतंकों की शैली गढ़ते देखे हैं
जिनके बाजू केसर की क्यारी तक बढ़ते देखे हैं
जो दामन में ओसामा लादेन छिपाकर बैठे हैं
अपनी आँखों में पिंडी के नैन छुपाकर बैठे हैं
उनकी साजिश-मक्कारी से मेरा भारत छला गया
और वार्ता करने उनके दरवाजे पर चला गया
भारत खून-सने हाथों से हाथ मिलाने पहुँच गया
सिंहराज कुत्तों के आगे पूंछ हिलाने पहुँच गया
अफगानी चेहरे से उजले मन के भीतर काले थे
तालिबान के सारे पासे मामा शकुनी वाले थे
उनसे कोई आशा करना दिल्ली की नादानी थी
इस चौसर में हर युधिष्ठिर की निश्चित हो जानी थी
दिल्ली के दरबार फ़ैसले ग़लत वरण कर बैठे हैं
पांडव खुद ही पांचाली का चीर-हरण कर बैठें हैं
स्वाभिमान को रहन किये बैठे हैं हम
खुद्दारी को दहन किये बैठे हैं हम
हमने सीने में अपमान सहेज लिया
हत्यारों के साथ मंत्री भेज दिया
मैं इस नादानी पर मुट्ठी कस -कस कर रह जाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ
जिनके दिल में दया नहीं उमड़ी रमजान महीने में
उनको फर्क नहीं मासूमों के मरने में जीने में
जब हत्यारों ने इंसानी रिश्ते-नाते त्यागे थे
और फिरौती में दिल्ली से छत्तिस कैदी मांगे थे
तब दिल्लीवालों ने केवल निर्णय एक लिया होता
छत्तिस के छत्तिस को तोप के मुँह से बांध दिया होता
काश हमारी दिल्ली की आँखों में काल दिखा होता
सिंहासन की आँखों का भी डोरा लाल दिखा होता
और चुनौती दे दी होती सीधे रावलपिंडी को
भीष्म पितामह क्षमा नहीं कर सकते और शिखंडी को
नयन तीसरा डमरू वाले शिव ने खोल दिया होता
ऊँचे स्वर में लालकिले से हमने बोल दिया होता
तनिक खरोंचें भी आई जो भारत के बाशिंदों को
जिन्दा एक नहीं छोड़ेंगे बंदी पड़े दरिंदों को
बंधक भी बचते भारत का गौरव भी जिन्दा रहता
और हमारा सर दुनिया में यूँ ना शर्मिंदा रहता
आतंकों के आँधी -तूफां - बादल सब रुकते दिखते
चंदा-तारे भारत माँ के चरणों में झुकते दिखते
काश उन्हें हम हिन्दुस्तानी पानी याद दिला देते
उनको क्या उनके पुरखों को नानी याद दिला देते
लेकिन हम तो हर कीमत पर समझौते के आदी हैं
मुँह पर चाँटा खाते रहने वाले गाँधीवादी हैं
ये कायरता का ना खेल हुआ होता
गद्दी पर सरदार पटेल हुआ होता
उग्रवाद की उम्र साँझ कर दी जाती
हर आतंकी कोख बाँझ कर दी जाती
मैं दरबारों की लाचारी को चाणक्य पढ़ाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ
मुक्त रुबिया का हो जाना निर्णय ग़लत हुआ हमसे
और तभी पूरी घाटी धुंधलाई आतंकी तम से
हमने अपनी खुद्दारी के सही जलजले नहीं किये
और हमारे दरबारों ने लौह-फ़ैसले नहीं किये
अर्जुन मछली की आँखों पर तीर चलाना चूक गये
मुट्ठी भर जुगनू सूरज के ज्योति-कलश पर थूक गये
राजनीति ने अपनी ही सेना के बाजू तोड़ दिए
बारी-बारी समझौतों में ख़ूनी कातिल छोड़ दिये
जब सिंहासन का राजा ही कायर दिखने लगता है
तो पूरा मौसम हत्यारा डायर दिखने लगता है
आखिर यूँ झुकते-झुकते दुनिया से क्या ले लेंगे हम
कोई दिल्ली मांगेगा तो क्या दिल्ली दे देंगे हम
बंधकजन के परिजन भी सब खुदगर्जी में झूल गये
अपने रिश्ते याद रहे भारत माता को भूल गये
उनके हर परिजन ने कायर होने का आभास दिया
नहीं किसी ने त्याग-धर्म का दिल्ली को विश्वाश दिया
काश कि उनके परिवारों ने हिम्मत ना तोड़ी होती
हमने जग में देश-प्रेम की अमर कथा जोड़ी होती
आखिर उन परिवारों की भी कोई जिम्मेदारी थी
सच पूछो तो दिल्ली उनके परिवारों से हारी थी
क्या ये देश उन्हीं का है जो सीमा पर मर जाते हैं
अपना खून बहाकर टीका सरहद पर कर जाते हैं
ऐसा युद्ध वतन की खातिर सबको लड़ना पड़ता है
संकट की घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है
जो भी कौम वतन की खातिर मरने को तैयार नहीं
उसकी संतति को आजादी जीने का अधिकार नहीं
अब जग के दादाओं से डरना छोडो
और कराची से अपना नाता तोड़ो
अब एक और महाभारत लड़ना होगा
चक्र सुदर्शन लेकर के अड़ना होगा
मैं अर्जुन को श्रीकृष्ण की गीता याद दिलाता हूँ
इसीलिए मै केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ
किसके कितने लाल सलोने सीमा पर छिन जाते हैं
गुरु गोविन्द जी बेटे दीवारों में चिन जाते हैं
झाँसी की रानी लड़कर रजधानी मिटवा देती है
पन्ना धाय वफ़ादारी में बेटा कटवा देती है
मंगल पांडे आजादी का परवाना हो जाता है
उधम डायर से बदले को दीवाना हो जाता है
घास-फूँस की रोटी खाकर राणा नहीं लड़े थे क्या
बन्दा बैरागी के सर पर हाथी नहीं चढ़े थे क्या
वीर हकीकत राय धर्म की खातिर मरते देखे हैं
ऋषि दधिची भी अपनी हड्डी अर्पण करते देखे हैं
हाड़ी रानी शीश काट कर थाली में रख देती है
ये गाथा उनको सूरज की लाली में रख देती है
जेल भरे क्यूँ बैठे हैं हम आदमखोर दरिंदों से
आजादी का दिल घायल है जिनके गोरखधंधों से
घाटी में आतंकवाद के कारक सिद्ध हुए हैं जो
बच्चों की मुस्कानों के संहारक सिद्ध हुए हैं जो
उन जहरीले नागो को भी दूध पिलाती है दिल्ली
मेहमानों जैसी बिरयानी-मटन खिलाती है दिल्ली
आज समय को उत्तर देना ही होगा सिंहासन को
चीरहरण की कौन इजाजत देता है दुशाशन को
न्याय-व्यवस्था निर्णय करने में मजबूर रही तो क्यों ?
इनकी गर्दन फाँसी के फंदों से दूर रही तो क्यों ?
जिनकी जहरीली साँसों में आतंकों की आँधी है
उनको जिन्दा रखने में दिल्ली असली अपराधी है
कानूनों की हथकड़ियों को कड़ा करो
इनको फाँसी के फंदों पर खड़ा करो
पागल कुत्ते की हत्या मजबूरी है
गद्दारों को फाँसी बहुत जरुरी है
मैं बजरंगबली को उनकी ताकत याद दिलाता हूँ
इसीलिए मै केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ
लोकतंत्र
मेहेंदियों का रंग ख़ूनी रंग में बदल दिया
जो घरों में ला रहे हैं जंगलों की आग को
और जो जगा रहे हैं जातियों के नाग को
जिनका है अतीत वैमनस्य के जूनून का
और सर पे पाप है पहाड़ियों के खून का
इस चमन में बुलबुलों के पंख नोचतें हैं जो
वे कोई बड़े खुदा हैं खुद ही सोचते हैं जो
जिनके यहाँ ख़ूनी दाग साफ़ किये जाते हैं
फाँसी वाले गुनाहगार माफ़ किये जाते हैं
जिसने गुण्डे हौंसलों को दी सदैव थपकियाँ
और हल्ला बोल-बोल दी कलम को धमकियाँ
जिसके राज में जली हैं प्रेस की भी होलियाँ
और भीड़ पर चली हैं बेशुमार गोलियाँ
जिसने टूट के कगार ला दिया समाज को
जो नहीं बचा सके हैं माँ बहन की लाज को
जिसके आस-पास गुण्डे तस्करों का जोर है
उनके हाथ में वतन की आज बागडोर है
मेरा वास्ता नहीं है कोई राजपाट से
इक सवाल पूछता हूँ रोज राजघाट से
मेरी नींद खो गयी हुजूर इस मलाल में
क्या वतन को मिलना था यही पचास साल में
कल जो घर से भागा किसी ज्ञान की तलाश में
करोड़ों की संपदा है आज उसके पास में
गोरैया के बच्चों को जला दिया है नीड़ ने
आस्थाएं तोड़ दी हैं साधुओं की भीड़ ने
पाखण्डी परम्परा है आन-बान-शान की
है करोड़ों की कमी मजहबी दुकान की
पूजा पाठ हो रहा है धन्ना सेठ के लिये
कोई यज्ञ होता नहीं भूखे पेट के लिये
भगवानों के चित्रों से भभूत झड़ी मिली है
साधुओं की देह हीरे मोती जड़ी मिली है
कोई स्वर्ग जाने हेतु दे रहा है सीढियाँ
कहीं भूत-प्रेतों से ही डर रही हैं पीढियाँ
कोई सुबह का उजाला रैन बना देता है
कोई चमत्कार स्वर्ण चैन बना देता है
कोई मन्त्र -सिद्धि की ही दे रहा है बूटियाँ
कोई हवा में ही बना देता है अंगूठियाँ
पर कोई गरीबों की लँगोटी न बना सका
कोई स्वामी संत बाबा रोटी न बना सका
बहुत सरल हूँ
जिनके पैरों में छाले हैं मै उनकी आँखों का जल हूँ |
मै पीड़ाओं का गायक हूँ
शब्दों का व्यापार नहीं हूँ
जंहा सभी चीजें बिकती हैं
मै ऐसा बाज़ार नहीं हूँ
मुझ पर प्रश्न चिन्ह मत थोपो कुंठित व्याकरनी पैमानो
मुझको रामकथा - सा पढ़िये बहुत सहज हूँ, बहुत सरल हूँ |
दरबारों कि मेहरबानियाँ
जड़ भी चतुर सुजान हो गए
जुगनू विरुदावलियाँ गाकर
साहित्यिक दिनमान हो गए
मै डरकर अभिनन्दन गाऊँ, इससे से अच्छा है मर जाऊं
मै सागर का क़र्ज़ चुकाने वाला आवारा बदल हूँ |
मैंने पगडण्डी नापी है
आपने पैरों हौले- हौले
मेरे दर से खाली लौटे
राजनीति के उड़नखटोले
राजभवन के कालीनों पर मेरे ठोकर चिन्ह मिलेंगे
मै आँसू का ताजमहल हूँ झोपड़ियों का राजमहल हूँ |
मेरा मोल लगाने बैठे हैं
कुछ लोग तिजोरी खोले
दुनिया में इतना धन कब है
जो मेरी खुद्दारी तोले.
जब से मुझको नील-कंठ्नी कलम विधाता ने सौंपी है
तन में चित्रकूट - वृन्दावन, मन में गंगा कि कलकल हूँ |
हाथ कि कलम कहीं कुदाल न हो जाये
ये तिरंगा किसी का रुमाल न हो जाये
और व्यवस्था कहीं छिनाल न हो जाये
इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये
बचपनों के पालने अभाव में जले,
भूखी माँ कि आँसुओं कि गोद में पले
लाचारी कि गोद में पले हुए हैं जो
दर्दो-गम कि आग में जले हुए हैं जो
वे कहाँ पे जायें अब सुकून के लिये,
काम नहीं है जवान खून के लिये
भूखे पेट भूख में चिल्लाने लगें तो,
खाली हाथ पत्थर उठाने लगे तो
अरमानों का कुचलना जो नहीं रुका तो,
पत्थरों का उछलना जो नहीं रुका तो
दिल्ली के विचारों को बदलना पड़ेगा,
नौजवान खून को मचलना पड़ेगा
कसमसाने - सी लगी है ये वसुंधरा,
मुरझाने लगा है ये चमन हरा-भरा
खून के छींटें हैं भारती के भाल पर
मौत रो रही है हरिजनों के हाल पर
महलों के लिये तो चांदनी - कतार है,
शहीदों के मजारों पे अन्धकार है
भीड़-भाड़ वाली भीड़-भाड़ न हो जाये,
और माँ का चीर, चीर फाड़ न हो जाये
इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये
सामने जो ढहता हुआ सा मकान है,
अच्छी तरह देख लो यह संविधान है
ऐरे- गैरे नत्थू खैरे तंत्री हो गए
जिनको जेलों में होना था मंत्री हो गए
शासकों विरोधियों में फर्क क्या करें,
कोई फर्क ही नहीं है तर्क क्या करें
खून से रोपे अंगूर खट्टे हैं सभी,
एक थैली के ही चट्टे-बट्टे हैं सभी
नौकरशाही भी पाखंडी होने लगी है,
बदतमीजी भी रणचंडी होने लगी है
लालबहादुर कि राख ठंडी न हो जाये,
और संसद कहीं सब्जीमंडी न हो जाये
इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये
जिन्दा कौम झूठ कि जयकार क्यों करें,
भीगी आँखे सिंहासन को प्यार क्यों करें
पीड़ा पहरेदार है हमारे गाँव में,
भूख कि जंजीर है हमारे पाँव में
रोटी नहीं है हज़ार पेटों के लिये,
क्या हुआ है गरीबों के बेटों के लिये
भूखे-प्यासे रो रहे हैं पप्पू देश में,
करोड़ों में खेलता है अप्पू देश में
महलों के लिये भले गुनाह कीजिये
झोंपड़ी कि और भी निगाह कीजिये
होश और जोश में जता रहे हैं हम
और अपनी दिल्ली को बता रहे हैं हम
झोपडी का खून कोई पानी नहीं है,
राजधानी कोई महारानी नहीं है
बुलडोज़र ही देश का कानून न हो जाये,
कोई आतंकी भी अफलातून न हो जाये
इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये
देश का ईमान बेईमान हो गया,
आदमी मकान से दुकान हो गया
गर्म हवा गाँव-गाँव डोल रही है,
कोयल भी काँव-काँव बोल रही है
बाढ़ कि नदी में सब बहने लगे हैं,
साँझ के तारे को भोर कहने लगे हैं
न्याय कि व्यवस्था कि ये कैसी घड़ी है,
न्यायाधीश को भी गोली खानी पड़ी है
बेड़ियों से गुंडागर्दी छूट रही है,
पारा-पारा हो के धारा टूट रही है
सत्ता में जनता यकीन खोने लगी है,
डाकुओं कि ताजपोशी होने लगी है
राजनीति डाकुओं की सम्बल न हो जाये,
और मेरा पूरा देश चम्बल न हो जाये
इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये
हाँ हुजूर मै चीख रहा हूँ
हाँ हुजूर मै चिल्लाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
मेरा कोई गीत नहीं है किसी रूपसी के गालों पर
मैंने छंद लिखे हैं केवल नंगे पैरों के छालों पर
मैंने सदा सुनी है सिसकी मौन चांदनी की रातों में
छप्पर को मरते देखा है रिमझिम- रिमझिम बरसातों में
आहों कि अभिव्यक्ति रहा हूँ
कविता में नारे गाता हूँ
मै सच्चे शब्दों का दर्पण
संसद को भी दिखलाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
अवसादों के अभियानों से वातावरण पड़ा है घायल
वे लिखते हैं गजरे, कजरे, शबनम, सरगम, मेंहदी, पायल
वे अभिसार पढ़ाने बैठे हैं पीड़ा के सन्यासी को
मैं कैसे साहित्य समझ लूँ कुछ शब्दों कि अय्याशी को
मै भाषा में बदतमीज हूँ
अलंकार को ठुकराता हूँ
और गीत के व्यकरानो के
आकर्षण से कतराता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
दिन ढलते ही जिन्हें लुभाएँ वेशालय औ' मधुशालाएँ
माँ वाणी के अपराधी हैं चाहे महाकवि ही कहलायें
अपराधों की अभिलाषाएं मौन चाँदनी कि मस्ती में
जैसे कोई फूल बेचता हो भूखी-नंगी बस्ती में
मैं शब्दों को बजा-बजा कर
घुंघुरू नहीं बना पता हूँ
मै तो पांचजन्य का गर्जन
जनगण-मन तक पहुँचाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
जिनके गीतों कि जननी है महबूबा कि हँसी- उदासी
उनको रास नहीं आ सकते ऊधमसिंह औ' रानी झाँसी
मुझसे ज्यादा मत खुलवाओ इन सिद्धों के आवरणों को
इससे तो अच्छा है पढ़ लो तुम गिद्धों के आचरणों को
मै अपनी कविता के तन पर
गजरे नहीं सजा पता हूँ
अमर शहीदों कि यादों से
मै कविता को महकता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ
मैंने क्यूँ गाये हैं नारे
मुझे कोई परवाह नहीं है मुझको नारेबाज बताओ
लेकिन मेरी मजबूरी को तुमने कब समझा है प्यारे |
लो तुमको बतला देता हूँ मैंने क्यूँ गाये हैं नारे ||
जब दामन बेदाग न हो जी
अंगारों में आग न हो जी
घूँट खून के पीना हो जी
जिस्म बेचकर जीना हो जी
मेहनतकश मजदूरों का भी
जब बदनाम पसीना हो जी
जनता सुना रही हो नारे
संसद भुना रही हो नारे
गम का अँगना दर्द बुहारे
भूखा बचपन चाँद निहारे
कोयल गाना भूल रही हो
ममता फाँसी झूल रही हो
मावस के डर से भय खाकर,
पूनम चीख़े और पुकारे
हो जाएँ अधिकार तुम्हारे
रह जाएँ कर्तव्य हमारे
छोड़ - छाड़ जीवन-दर्शन को तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||
निर्वाचन लड़ते हैं नारे
चांटे से जड़ते हैं नारे
सत्ता की दस्तक हैं नारे
कुर्सी का मस्तक हैं नारे
गाँव-गली, शहरों में नारे,
सागर की लहरों में नारे
केसर की क्यारी में नारे
घर की फुलवारी में नारे
सर पर खड़े हुए हैं नारे,
दाएँ अड़े हुए हैं नारे
नारों के नीचे हैं नारे
नारों के पीछे हैं नारे
जब नारों को रोज पचाने
को खाने पड़ते हों नारे
इन नारों से जान बचाने
को लाने पड़ते हों नारे
छोड़ गीत के सम्मोहन को तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||
जब चन्दामामा रोता हो
सूरज अँधियारा बोता हो
जीवन सूली-सा हो जाये,
गाजर-मूली सा हो जाये,
पूरब ज़ार-ज़ार हो जाये
पश्चिम को आरक्षण खाए
उत्तर का अलगावी स्वर हो
दक्षिण में भाषा का ज्वर हो
अपने बेगाने हो जायें
घर में ही काँटे बो जायें,
मानचित्र को काट रहे हों
भारत माँ को बाँट रहे हों
ग़ैर तिरंगा फाड़ रहे हों
अपने झण्डे गाड़ रहे हों,
जब सीने पर ही आ बैठें
भारत माता के हत्यारे
छोड़ - छाड़कर सूर-कबीरा तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||
कलियाँ खिलने से घबरायें
भौंरे आवारा हो जायें
फूल खिले हों पर उदास हों,
पहरे उनके आस-पास हों
पायल सहम-सहम कर नाचे,
पाखण्डी रामायण बाँचे
कूटनीति में सब चलता हो,
मर्यादा का मन जलता हो
उल्लू गुलशन का माली हो
पहरेदारी भी जाली हो
संयम मौन साध बैठा हो
झूठ कुर्सियों पर ऐंठा हो
चापलूस हों दरबारों में,
ख़ुद्दारी हो मझ्धारों में
बलिदानी हों हारे-हारे,
डाकू भी लगते हों प्यारे
छोड़ चरित्रों की रामायण तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||
सारे जहाँ से अच्छा
और पुलिसे के थाने ऐसे, जैसे गुंडों का धंधा
मुठभेड़ों के नाम पे हत्या होती है निर्दोषों की
चौराहों की मर्यादा है ठोकर में मदहोशों की
जहाँ वर्दियों की बाँहों में अबला की चीखें गुम हैं
गाँधी की नैतिकता वाली आँखों के आगे तम हैं
भारत गाँधी के सपनो का कातिल है हत्यारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!
गर्मी, सर्दी, बरसातों में निर्धन मर जाये तो क्या
आमों की गुठली के आटे की रोटी खाये तो क्या
आदिवासियों की मजबूरी पेड़ों की पत्ती खायें
झोपड़ियों में पैदा होकर फुटपाथों पर मर जायें
हमने अपनी झोपड़ियों के आँगन भूख सहेजी है
लेकिन अपनी कला नाचने अमेरिका में भेजी है
जो भूखों से भीख मांग ले भारत वो बंजारा है !
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!
ख़ूनी दंगों के जंगल ही जंगल जिसके आँगन में
लाखों चोटें खायें बैठा है जो अपने दामन में
जिसके पूजाघर शामिल हैं होड़ों में हथियारों की
ईंटें भी रोती होंगी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों की
जिसका रोज तिरंगा अपने लोहू में सन जाता है
बेटे का पिस्टल माँ के ही सीने पर तन जाता है
भगतसिंह की धरती पर भी खालिस्तानी नारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!
कफ़न-खसोटे तक भी हमसे बेशर्मी में हार गये
भारत के मुर्दे भी बिक-बिक कर सीमा के पार गये
हमने आडम्बर ओढ़ा है धर्म-कर्म के सायों का
पर दुनिया वालों के आगे माँस परोसा गायों का
यहाँ पुजारी भी बैठे हैं आँखों में नाखून लिये
और ब्रह्मचारी फिरते हैं जेबों में कानून लिये
राम तुम्हारी गंगा मैली गंगाजल भी खारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!
जहाँ अभी भी मानव की बलि रोज चढ़ाई जाती है
पत्थर की मूरत भी लोहू से नहलाई जाती है
जुबाँ कली की, घूँघट उठने से पहले सिल जाती है
इस भारत में दूध नहीं मिलता, मदिरा मिल जाती है
यहाँ रोज लाशें बनती हैं दुल्हन बिना दहेजों की
और रोज संख्या बढ़ जाती है आवारा सेजों की
बेबस नोची हुई कली का चकला यहाँ सहारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!
यहाँ बुद्धि तोली जाती है जाति-सने आधारों से
सत्ता की नैया चलती है आरक्षित पतवारों से
कूटनीतियाँ तोड़ रही हैं निर्धन की खुद्दारी को
और योग्यता झेल रही है कुर्सी की गद्दारी को
यहाँ परीक्षा से पहले परिणाम सुरक्षित होता है
मिट्टी के माधो का भी सम्मान सुरक्षित होता है
आरक्षण-कानून वतन की प्रतिभा का हत्यारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!
तस्वीर दिखने लाया हूँ
मै भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत पढूंगा जन-गण-मन के क्रंदन के
जब पंछी के पंखों पर हों पहरे बम के, गोली के
जब पिंजरे में कैद पड़े हों सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पार हों दाग लहू की होली के
कैसे कोई गीत सुना दे बिंदिया, कुमकुम, रोली के
मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आँसू गाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||
कहाँ बनेगें मंदिर-मस्जिद कहाँ बनेगी रजधानी
मण्डल और कमण्डल ने पी डाला आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बस्ते मजहब के स्कूल गये
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गये
कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल चलें
सोन -चिरैया सूली पर है पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो माँ का दामन नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको जिम्मेदारी सौंपी घर भरने में व्यस्त मिला
क्या ये ही सपना देखा था भगतसिंह की फाँसी ने
जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||
एक नया मजहब जन्मा है पूजाघर बदनाम हुए
दंगे कत्लेआम हुए जितने मजहब के नाम हुए
मोक्ष-कामना झांक रही है सिंहासन के दर्पण में
सन्यासी के चिमटे हैं अब संसद के आलिंगन में
तूफानी बदल छाये हैं नारों के बहकावों के
हमने अपने इष्ट बना डाले हैं चिन्ह चुनावों के
ऐसी आपा धापी जागी सिंहासन को पाने की
मजहब पगडण्डी कर डाली राजमहल में जाने की
जो पूजा के फूल बेच दें खुले आम बाजारों में
मैं ऐसे ठेकेदारों के नाम बताने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||
कोई कलमकार के सर पर तलवारें लटकाता है
कोई बन्दे मातरम के गाने पर नाक चढ़ाता है
कोई-कोई ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई गंगा-यमुना अपने घर में भरने लगता है
कोई तिरंगे झण्डे को फाड़े-फूंके आजादी है
कोई गाँधी जी को गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोंप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना यू. एन. ओ. में ले जाता है
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है
लेकिन सौ गाली होते ही शिशुपाल कट जाते हैं
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||
जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है
तो बगुला भगतों की टोली हंसों को खा जाती है
इनको कोई सजा नहीं है दिल्ली के कानूनों में
न जाने कितनी ताकत है हर्षद के नाखूनों में
जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तब माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब-जब भी जयचंदों का अभिनन्दन होने लगता है
तब-तब साँपों के बंधन में चन्दन रोने लगता है
जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते हैं
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते हैं
सिंहों को 'म्याऊं' कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है
बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है
कहते हैं यदि सच बोलो तो प्राण गँवाने पड़ते हैं
मैं भी सच्चाई गा-गाकर शीश कटाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||
'भय बिन होय न प्रीत गुसांई' - रामायण सिखलाती है
राम-धनुष के बल पर ही तो सीता लंका से आती है
जब सिंहों की राजसभा में गीदड़ गाने लगते हैं
तो हाथी के मुँह के गन्ने चूहे खाने लगते हैं
केवल रावलपिंडी पर मत थोपो अपने पापों को
दूध पिलाना बंद करो अब आस्तीन के साँपों को
अपने सिक्के खोटे हों तो गैरों की बन आती है
और कला की नगरी मुंबई लोहू में सन जाती है
राजमहल के सारे दर्पण मैले-मैले लगते हैं
इनके ख़ूनी पंजे दरबारों तक फैले लगते हैं
इन सब षड्यंत्रों से परदा उठना बहुत जरुरी है
पहले घर के गद्दारों का मिटना बहुत जरुरी है
पकड़ गर्दनें उनको खींचों बाहर खुले उजाले में
चाहे कातिल सात समंदर पार छुपा हो ताले में
ऊधम सिंह अब भी जीवित है ये समझाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखने लाया हूँ ||
किस मौसम को पूजें
राजनीती का सारा वातावरण घिनौना है |
भोली जनता हर मौसम के लिये खिलौना है ||
उस मौसम में तानाशाही के दामन में प्यास पली
राजनीती के ताजमहल में नैतिकता की लाश जली
ये ऐसा मौसम है, जिसकी दुल्हन नयी नवेली है
असली पति है कौन, अभी तक यह भी एक पहेली है
उस मौसम में एक बाज था, सारे पंछी डरते थे
उसकी पलकें झुकती थी तो चन्दा-तारे ढ़लते थे
इस मौसम का बाज संत है, पंछी उसे डराते हैं
बाज मियां भी कुर्सी की खातिर सब कुछ सह जाते हैं
उस मौसम ने मनमानी को नाम दिया अनुशासन का
इस मौसम में पग-पग पर बँटवारा है सिंहासन का
तब भी मांझी छला गया था, अपनी ही पतवारों से
इस दुल्हन की डोली को भी डर है स्वयं कहारों से
उस मौसम के पाप-पुण्य तो हमने भोग लिये
देखें इस दुल्हन का कब तक रूप सलौना है ?
भोली जनता हर मौसम के लिये खिलौना है ||
उस मौसम ने जन्म दिया था पतझर को, तूफानों को
इस मौसम ने कफ़न दिया है, अनब्याहे अरमानों को
हरिजन पहले भी मरते थे, अब भी उपसंहार नहीं
उन पर कोई दवा नहीं थी, इन पर भी उपचार नहीं
तब तूफ़ान में नैया थी, अब नैया में तूफ़ान है
दंगा कल सड़कों पर था अब संसद का मेहमान है
तब आँसू पर पाबंदी थी, अब अधरों पर हँसी नहीं
उस मौसम में दर्द बहुत था इस मौसम में ख़ुशी नहीं
निर्धन कल भी अंबर की चादर में सोता था
और आज भी धरती उसके लिये बिछौना है |
भोली जनता हर मौसम के लिये खिलौना है ||
Friday, September 3, 2010
Thursday, August 12, 2010
ऐसा एक दोस्त चाहिए
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,
ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,
कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,
उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,
मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,
उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझदार मे,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,
अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,
यूँ तो 'मित्र' का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए!
Friday, July 30, 2010
मोहब्बत का सितारा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा
कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा
काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा
किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा
देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा
और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा
जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा
Thursday, July 29, 2010
Maa
तो कही जा के थोडा सा सकूँ पाती है माँ ,
रूह के रिश्तों की ये गहरायिया तो देखिये ,
चोट लगती है हमे और चिल्लाती है माँ ,
मांगती है कुछ नहीं अपने लिए भगवन से ,
अपने बच्चो के लिए दमन को फैलाती है माँ ,
प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज़ है ,
कोई उन बच्चो से पूछे जिन की गुज़र जाती है माँ ,
चाहे हम खुशिओं में माँ को भूल जाएँ दोस्तों,
जब मुसीबत सर पे आती है तू बहुत याद आती है माँ.
Wednesday, July 14, 2010
Saturday, July 10, 2010
जर्रे जर्रे में गुनाह होते हुऎ देखा ।
रग रग में लहू बन के जो दौड़ता था,
मैनें उसको भी स्याह होते हुऎ देखा ।
उचाँईयों से ना मेरा जिक्र करो ,
खुद को गर्दिश में पनाह होते हुऎ देखा ।
जो समझता था मुझे मुझसे ज्यादा ,
मैने उसको भी खफ़ा होते हुऎ देखा ।
गैरों की क्या बात करूँ तुमसे ,
मैनें अपने साये को जुदा होते हुऎ देखा
Friday, July 9, 2010
KYA WO INSAAN THA
MERA WAHEM THA YA WO MERA GUMAAN THA
DE KAR ZAKHAM WO MARHAM RAKHTA THA
BAN RHA THA WO YA WAQAI ITNA NADAAN THA
MUJHSE BICHAD GYA THA WO EK RAAT
WO SHAKHS JO KAL TAK MERI PECHAN THA
KASH K WO BAN JATA MERA HAMARA HUMDAM
KITNA DIL KO IS BAAT KA ARMAAN THA
KHUDA KO CHAHTE ITNA TO KUCH MIL JATA SHAYAD
HUMNE CHAHA JIS KO WO EK INSAN THA
Thursday, July 8, 2010
क्यों नहीं लिखता मै
Wednesday, June 23, 2010
my past
ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा
मगर मुझको लौटा दो वो क्वालेज का कन्टीन,
वो चाय का पानी, वो तीखा समोसा..........
कडी धूप मे अपने घर से निकलना,
वो प्रोजेक्ट की खातीर शहर भर भटकना,
वो लेक्चर मे दोस्तों की प्रोक्झी लगाना,
वो सर को चीढाना ,वो एरोप्लेन उडाना,
वो सबमीशन की रातों को जागना जगाना,
वो ओरल्स की कहानी, वो प्रक्टीकल का किस्सा.....
बीमारी का कारण दे के टाईम बढाना,
वो दुसरों के Assignments को अपना बनाना,
वो सेमीनार के दिन पैरो का छटपटाना,
वो WorkShop मे दिन रात पसीना बहाना,
वो Exam के दिन का बेचैन माहौल,
पर वो मा का विश्वास - टीचर का भरोसा.....
वो पेडो के नीचे गप्पे लडाना,
वो रातों मे Assignments Sheets बनाना,
वो Exams के आखरी दिन Theater मे जाना,
वो भोले से फ़्रेशर्स को हमेशा सताना,
Without any reason, Common Off पे जाना,
टेस्ट के वक्त Table me मे किताबों को रखना,
ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा
Monday, June 14, 2010
sakahaar
Sunday, June 13, 2010
उतरा है राम राज्य विधायक निवास मेँ ।।
पक्के समाजवादी हैँ तस्कर होँ या डकैत ।
इतना असर है खादी के उजले लिबास मेँ ।।
पैसे से आप चाहेँ तो सरकार गिरा देँ ।
संसद बदल गयी है यहाँ की नक्खास मेँ ।।
आजादी का वो जश्न मनाएँ तो किस तरह ।
जो आ गये फुटपाथ पर घर की तलाश मेँ ।।
जनता के पास एक ही चारा है बगावत ।
ये बात कह रहा हूँ मैँ होशो हवास मेँ ।
Thursday, June 10, 2010
आइना हूँ मैं जरा मेरे सामने आकर देखो,
खुद नज़र आओगे जरा आँख मिला कर देखो,
मेरे गम में मेरी तकदीर नज़र आती है,
डगमगा जाओगे मेरे दर्द उठा कर देखो,
यूँ तो आसान नज़र आता है मंजिल का सफ़र,
कितना मुश्किल है मेरी राह से जाकर देखो ,
दिल तुम्हारा है मैं ये जान भी दे दूँ तुम्हे पर,
बस मेरा साथ ज़रा दिल से निभा कर देखो
Friday, May 28, 2010
Saturday, May 22, 2010
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
लुटेरे बन गये
ज़माने के खैरख्वाह।
उठाये थे पहले भी गरीब
साहुकारों का बोझ
भले ही भरकर रह जाते थे आह,
अब भी कहर बरपा रहे
लुटेरे तमंचों के जोर पर रोज
फिर भी बोलना पड़ता है वाह वाह।
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इतिहास क्यों पुराना सुनाते हो,
यहां घट रहा है रोज नया घटनाक्रम
तुम पुरानी कथा क्यों सुनाते हो।
पढ़ लिखकर किताबें क्यों ढूंढ रहे हो
जमाने को दिखाने का रास्ता,
अपनी खुद की सोच बयान करो
मत दो रद्दी हो चुके ख्यालों का वास्ता,
पुराने समय के नायकों की याद में
नये खलनायकों की चुनौती क्यों भुलाते हो।
Thursday, May 20, 2010
वो मेरे हर झूठ से खुश होती,
जिसे हमेशा सच बोलने की आदत थी,
वो एक आंसू भी गिरने पर खफा होती थी,
जिसे तन्हाई में रोने की आदत थी,
वो कहती थी की मुझे भूल जाओगे,
जिसे मेरी हर बात याद रखने की आदत थी,
हमेशा माफ़ी मांगने के बहाने से,
रोज़ गलतियाँ करना उसकी आदत थी,
वो जो दिल जान न्योछावर करती थी मुझ पर,
मगर छोटी सी बात पर रूठना उसकी आदत थी,
हम उसके साथ चल दिए पर ये नहीं जानते थे,
की रास्ते में ही छोड़कर उन्हे जाने कि आदत है,,
Saturday, May 15, 2010
दर्द का अपना इक मकान भी था
दोस्त था और मेहरबान भी था
ले रहा मेरा इम्तिहान भी था
शेयरों में गज़ब़ उफान भी था
कर्ज़ में डूबता किसान भी था
आस थी जीने की अभी बाकी
रास्ते में मगर मसान भी था
कोई काम आया कब मुसीबत में
कहने को अपना ख़ानदान भी था
मर के दोज़ख मिला तो समझे हम
वाकई दूसरा जहान भी था
उम्र भर साथ था निभाना जिन्हें
फ़ासिला उनके दरमियान भी था
ख़ुदकुशी कर ली क्यों तूने
तेरी क़िस्मत में आसमान भी था
Wednesday, May 12, 2010
Nyay
kya ho gya agar hmari sarkar ne Ajmal kasab naam k pakistani kutte ko fansi de di hai… me kehta huu kya jarurat thi us kutte ko makhkhan lagi roti or murge khilane ki… Air conditioned jail me rakhne ki…. kya wo koi pakistani rajdoot (embassdor) tha… ya phir koi wahan ka celebrity tha…. or kya kaha jaye ek fansi ki saja sunnane k liye 4 dinon tak pata nhi kis cheej ka intezzar hota raha… ye sab cheje samjh se bahar hain… shayad soch rahe the pakistan naam ka kutta apni dum hilate hue aayega or ink double kutton k pairon me letega or dikhayega ki dekho malik meri dum seedhi ho chuki hai… ya phir pak k wajir e aala akar mafi mange ge…
Me 1 prashan sabse puchna chahtaa huu….
kya us kutte ko fansi dene se kuch pareshaani kam ho gyi hai….
isse kya aatankwaad khatam ho gya hai,
kya iss samaj se ashuraksha ki bhawana khatam ho gyi hai…
ye harami neta log us mohre ko fansi pr latka kr ye soch rahe hai ki hamne Osama-bin-laden ko maar diya hai…
ishwar ki kripa hai world trade center, new york, me 2001 me jo hamla hua tha… wo hamare yahan mumbai k taj hotel yaa dalal street pr sitht stock exchange pr nahi hua… warna bechari sarkaar 10 saal tak to bahut mushkil se
Message of Peigons: we wanna peace not war...
pakade hue doshiyon k dosh nidharan me laga deti or fir kam se kam 6 mahine ye sochti rehti ki un sabko fansi di jaye yaa unki jail me khatidari ki jaye…. (jo apne yahan abhi tak nhi hui hai itne bade jhatko ko baar baar sehne k baad b)
or usk baad pata hai apko kya hota… 5 saal lag jate desh ki surkshaa vyavastha ko majboot krne me…
khair me apko iss kalpana k peeche ki wajah ko batata huu..
amerika walon ne 1 saal me sabhi doshiyon ko jo saza deni thi de li or apne yahan k surksha kanoono ko or kada kr diya or ye koi kisi ek vyakti k liye nhi balki sabhi logo k liye tha … chahe wo wahan ki aam janta ho , koi neta ho, ya phir unke saat samundar paar krk aya hua koi mehmaan ….!
To ab ap ye batayein ki uss kutte k pille ko fansi dene se kya fayda hua…
Aatankwaad jad se khatam ho gya..
ya aam nagrik ki surkhsha vyavastha me ijafa ho gya hai….
ya phir sare aatnkwadi hamlo pr chal rahi karyawahiyon ka b paridam aa gya hai…
… agr ap kahe ki hmne us kutte ko yani pakistaan ko duniya ki najron me uska asli chehra dikha diya hai… to ap ye bataeyein ki kya kutte ki tedi dum seedhi hui hai.. hai ki nahi…?????
bilkul nahi… !!
arre chhoddiye…. aaj hamare me desh kai kasab baki hai or wo sab safed karnamon ki aad lekr khule aam desh ki janta ka katle aam kr rahe hain..|
Swiss banko me gair kanooni dhang se rupye kamakr rakhte hain, har chhoti badi pariyojnaa jo ki janta k hit me janta k rupyo se banti hai, usme se comminssion k naam pr kha jate hai or apne chunaav jeetne k liye, sarkar se milne wali madad k alawa, usme chada dete hain,
ya phir apne shauk pure krne k liye iss bholi bhali janta k rupyon ka galat istemaal krte hain apne liye farm house banate hai,
ek se badkr ek mengi gadiya khardite hain,
ye rupyaa desh ki janta bahut mehnat se kamaya hua rupya hai, jo ki sarkaar tax k rup me, desh k vikaas k naam pr leti hai. House tax leti hai, or service tax b wasulti hai.. bina koi servce diye.
desh k kisaan k dwara bahut mehnat se ugaya hua anaj sadne ko chhod deti hai, or desh ki janta ko bacha hua anaaj mehnge daamo pr dilwati hai, or iski sahi kimat ko kabhi kisaano ko diya nhi jata hai, or iss tarah hazaron lakhon logo ko ye kamine, aalsi, namakharam neta log jeete jee bina khoon bahaye maar dalte hain.
Arre ye khud kitne darpok hote hain, ye khud nhi jante hain, or ham sab aam log inse jyada bahadur hain.
sochiiye kaise…. jab raat hoti hai to pure pure mohhle, coloniyan, bastiyaan mushkil se 4 yaa 5 police walon ya phir 1-2 home-guard ya kahiye chauki daar k bharose pr hoti hai. or inn chuhon ki raksha k naam ek do nahi balkki hazarron black cat commondos or police wale lage hue hai…
galti ho gyi ye police wale jo ki inn neta logo ki tarah hee nikkme hote hain, kabhi kisi ghatna sthal pr samay se nhi pahuch sakte hain, kabhi ek daketi-hatya ki ghatna k mamle ko suljhane me mahine se lekar saal laga dete hain, iske kai udharan mil jayenge.. jaise ki Aarushi murdur case…
or roj-roj hone wale cases jaise ki mobile chinna, mataon -behno k gale se chain/mangalsutra/ or hand bag lutna jaise ghatnao ko darj hee nhi krte hai.. iska bhukt-bhogi to me khudd hee huu… maine apne mobile chori hone ki report darj krwaane k majboori me 50 rupyee diye hain (taki me apna mobile no change se bacha saku..) wo b u.p. rajya k sabse pragtisheel shehar NOIDA me…. truck walon se, aam janta se checking k naam pr wasooli krne me lage rehte hain…. pata hai apko kyu… kyuki ye kehte bhaisahab hamari aamdani bahut kam hai… ab in salon ko kaun bataye jin garib kisaano ka mehnat se ugaya hua anaaj kabhi badkismati se jal jata hai ya na bhi jale to bhi wo kis tarah jeeta hai apne pariwaar ko chalata hai… ya phir ek rikshaw wala ya phir ek majdoor/mistri kis tarah din bhar dhoop me tapkar rupye kamata hai or apne biwi bachchon ka pet palta hai or saath hee koshish krta hai ki usk bachche kahin achche school me pad likh b jaye….
Kai kasab hain jinko puri chhoot hai loot khasote krne ki, jeete jee logo ko mar-dalne ki… ab unka naam lekar apne vyathith hote hue mann ko or dukhi nahi krna chahta huu…!!
(agar mere dwara kuch apmaan janak shbdo ka prayog kisi ko pareshaan krta hai to me uske shama yachna chahta huu…lekin kripya iss taraf bhi dhyan dijiyega ki agar koi apk saath kuch bura kare to ap unn cheejon ka gussa kaise vyakat karenge…)
(NOTE: Iss blog me vyakat kiye vichaar mere apne hain.. mere apne anubhav, kuch bhogi gyi parisithiyon k aadhaar pr hain… )