Monday, October 25, 2010

मैं बहुत बोलता हूं

एक बड़ा अवगुण है मुझ में, बहुत बोलता हूं,
धारदार पैने शब्दों के तीर छोड़ता हूं।
ऐसा नहीं कि मित्रों, मुझको इतना ज्ञान नहीं,
बहुत बोलना किसी विद्वता की पहचान नहीं।

पर जब अन्याय, अनीति का जोर देखता हूं,
अपने चारों ओर चोर ही चोर देखता हूं।

चुप बैठकर रहूं देखता, यह स्वीकार नहीं,
कायर ही अन्याय का करते प्रतिकार नहीं।

दरबारों का गीत मुझको नहीं सुहाता है,
मुझको तो बस खरी बात कहना ही आता है।

कोई क्या कहता है, इसकी परवाह नहीं,
बुद्धिमान कहलाऊं ऐसी मुझको चाह नहीं।

झूठ को सच कहने का मुझको हुनर नहीं आता
दिल में जलती आग हो तो चुप रहा नहीं जाता।

हूं तो अकेला चना, मगर मैं आँख फोड़ता हूं,
यह सच है मित्रों कि मैं बहुत बोलता हूं।

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