Saturday, October 2, 2010

डॉ. हरिओम पंवार

अधिकारों की खत्म कहानी है

जीवन भी जब शासन की सम्पत्ती होती हो
जहाँ साँस लेने में भी आपत्ती होती हो
छुप-छुप कर रोने पर भी जब पहरे बैठे हों
न्यायालय के आँगन में भी बहरे बैठे हों

जब कोई अधिकार नहीं होता हो सपनों का
जब कोई विश्वास नहीं होता हो अपनों का
जब कोई इन ओठों का हिलना भी बंद करे
माँ का अपने बच्चों से मिलना भी बंद करे

एक अपाहिज जो लेकर बैसाखी चलता हो
एक दिया जो आँचल की छाया में पलता हो
जब सूरज होने के भ्रम में दीपक ऐंठा हो
राजमहल का आँचल सर पे डाले बैठा हो

नदिया का तिनका भी खुद को बांध समझ ले जब
कोई जुगनू भी खुद को चाँद समझ ले जब
तब भी यदि समझौता करती हुयी जवानी है
तो फिर अधिकारों की समझो खत्म कहानी है


घाटी के दिल की धड़कन

काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था
डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था
काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था
काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था
काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में

ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है
गंधों के घर बंदूकों का मेला है
मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ
आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ
मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ
आजादी की पीड़ा का उच्चारण हूँ

इसीलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
छू कर तो देखो हिम छोटी के नीचे अंगारा है
दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल हटाकर दर्पण की
दरबारों की तस्वीरें भी हैं बेशर्म समर्पण की

काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केसर की क्यारी में
काश्मीर है जहाँ रुदन है बच्चों की किलकारी में
काश्मीर है जहाँ तिरंगे झण्डे फाड़े जाते हैं
सैंतालिस के बंटवारे के घाव उघाड़े जाते हैं
काश्मीर है जहाँ हौसलों के दिल तोड़े जाते हैं
खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते हैं

अपहरणों की रोज कहानी होती है
धरती मैया पानी-पानी होती है
झेलम की लहरें भी आँसू लगती हैं
गजलों की बहरें भी आँसू लगती हैं

मैं आँखों के पानी को अंगार बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
झरनों का पानी रक्तिम है झीलों में अंगारे हैं
काश्मीर है जहाँ फिजाएँ घायल दिखती रहती हैं
जहाँ राशिफल घाटी का संगीने लिखती रहती हैं
काश्मीर है जहाँ विदेशी समीकरण गहराते हैं
गैरों के झण्डे भारत की धरती पर लहरातें हैं

काश्मीर है जहाँ देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहाँ तीन सौ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहाँ दरिंदों की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छप्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहाँ हमारा राष्ट्रगान शर्मिंदा है
भारत माँ को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहाँ देश का शीश झुकाया जाता है
मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है

गूंगा-बहरापन ओढ़े सिंहासन है
लूले - लंगड़े संकल्पों का शासन है
फूलों का आँगन लाशों की मंडी है
अनुशासन का पूरा दौर शिखंडी है

मै इस कोढ़ी कायरता की लाश उठाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर

वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बँटवारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फिर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अँधियारों का

कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की
कुलवंती दासी हो गई रखैलों की
घाटी आँगन हो गई ख़ूनी खेलों की
आज जरुरत है सरदार पटेलों की

मैं घाटी के आँसू का संत्रास मिटाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
भारत माँ की मर्यादा के मंदिर खंडित होते हों
जब क्रश भारत के नारे हों गुलमर्गा की गलियों में
शिमला-समझौता जलता हो बंदूकों की नालियों में

अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिन की मोहलत दे दे तैय्यारी की
सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी

जिनको भारत की धरती ना भाती हो
भारत के झंडों से बदबू आती हो
जिन लोगों ने माँ का आँचल फाड़ा हो
दूध भरे सीने में चाकू गाड़ा हो

मैं उनको चौराहों पर फाँसी चढ़वाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
चाँद-सितारे टांक लिये हैं खून लिपि दीवारों ने
इसीलियें नाकाम रही हैं कोशिश सभी उजालों की
क्योंकि ये सब कठपुतली हैं रावलपिंडी वालों की
अंतिम एक चुनौती दे दो सीमा पर पड़ोसी को
गीदड़ कायरता ना समझे सिंहो की ख़ामोशी को

हमको अपने खट्टे-मीठे बोल बदलना आता है
हमको अब भी दुनिया का भूगोल बदलना आता है
दुनिया के सरपंच हमारे थानेदार नहीं लगते
भारत की प्रभुसत्ता के वो ठेकेदार नहीं लगते
तीर अगर हम तनी कमानों वाले अपने छोड़ेंगे
जैसे ढाका तोड़ दिया लौहार-कराची तोड़ेंगे

आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से
क्या डरना अमरीका के आकाओं से
अपने भारत के बाजू बलवान करो
पाँच नहीं सौ एटम बम निर्माण करो

मै भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन निकला हूँ ||



विमान-अपहरण

मैं ताजों के लिये समर्पण, वंदन गीत नहीं गाता
दरबारों के लिये कभी अभिनन्दन-गीत नहीं गाता
गौण भले हो जाऊँ लेकिन मौन नहीं हो सकता मैं
पुत्र- मोह में शस्त्र त्याग कर द्रोण नहीं हो सकता मैं
कितने भी पहरे बैठा दो मेरी क्रुद्ध निगाहों पर
मैं दिल्ली से बात करूँगा भीड़ भरे चौरोहों पर

दिल्ली को कोई आतंकी जादू- टोना लगता है
गीता-रामायण का भारत बौना -बौना लगता है
विस्फोटों की अपहरणों की स्वर्णमयी आजादी है
रोज गौडसे की गोली के आगे कोई गाँधी है
मैनें भू पर रश्मिरथी का घोड़ा रुकते देखा है
पाँच तमंचों के आगे दिल्ली को झुकते देखा है

हम पूरी दुनिया में बेचारे- से हैं
अपमानों की ठोकर के मारे- से हैं
मजबूरी संसद की सीरत लगती है
अमरीका की चौखट तीरथ लगती है
मैं दिनकर का वंशज दिल्ली को दर्पण दिखलाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

जब भारत का यान खड़ा था कंधारों की धरती पर
असमंजसता बनी हुई थी भारतीयों की मुक्ति पर
भीम छुपाकर मुँह बैठे थे बेशर्मी के दामन में
अर्जुन का गांडीव पड़ा था कायरता के आँगन में
रावन अट्टहास करता था पंचवटी की राहों में
राम घिरे लाचार खड़े थे गठबंधन की बाँहों में

हम हमदर्दी खोज रहे थे काबुल वाले गैरों में
हमने टोपी जाकर रख दी अफगानों के पैरों में
जो अफगानी आतंकों की शैली गढ़ते देखे हैं
जिनके बाजू केसर की क्यारी तक बढ़ते देखे हैं
जो दामन में ओसामा लादेन छिपाकर बैठे हैं
अपनी आँखों में पिंडी के नैन छुपाकर बैठे हैं

उनकी साजिश-मक्कारी से मेरा भारत छला गया
और वार्ता करने उनके दरवाजे पर चला गया
भारत खून-सने हाथों से हाथ मिलाने पहुँच गया
सिंहराज कुत्तों के आगे पूंछ हिलाने पहुँच गया
अफगानी चेहरे से उजले मन के भीतर काले थे
तालिबान के सारे पासे मामा शकुनी वाले थे

उनसे कोई आशा करना दिल्ली की नादानी थी
इस चौसर में हर युधिष्ठिर की निश्चित हो जानी थी
दिल्ली के दरबार फ़ैसले ग़लत वरण कर बैठे हैं
पांडव खुद ही पांचाली का चीर-हरण कर बैठें हैं

स्वाभिमान को रहन किये बैठे हैं हम
खुद्दारी को दहन किये बैठे हैं हम
हमने सीने में अपमान सहेज लिया
हत्यारों के साथ मंत्री भेज दिया

मैं इस नादानी पर मुट्ठी कस -कस कर रह जाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

जिनके दिल में दया नहीं उमड़ी रमजान महीने में
उनको फर्क नहीं मासूमों के मरने में जीने में
जब हत्यारों ने इंसानी रिश्ते-नाते त्यागे थे
और फिरौती में दिल्ली से छत्तिस कैदी मांगे थे
तब दिल्लीवालों ने केवल निर्णय एक लिया होता
छत्तिस के छत्तिस को तोप के मुँह से बांध दिया होता

काश हमारी दिल्ली की आँखों में काल दिखा होता
सिंहासन की आँखों का भी डोरा लाल दिखा होता
और चुनौती दे दी होती सीधे रावलपिंडी को
भीष्म पितामह क्षमा नहीं कर सकते और शिखंडी को
नयन तीसरा डमरू वाले शिव ने खोल दिया होता
ऊँचे स्वर में लालकिले से हमने बोल दिया होता
तनिक खरोंचें भी आई जो भारत के बाशिंदों को
जिन्दा एक नहीं छोड़ेंगे बंदी पड़े दरिंदों को
बंधक भी बचते भारत का गौरव भी जिन्दा रहता
और हमारा सर दुनिया में यूँ ना शर्मिंदा रहता
आतंकों के आँधी -तूफां - बादल सब रुकते दिखते
चंदा-तारे भारत माँ के चरणों में झुकते दिखते

काश उन्हें हम हिन्दुस्तानी पानी याद दिला देते
उनको क्या उनके पुरखों को नानी याद दिला देते
लेकिन हम तो हर कीमत पर समझौते के आदी हैं
मुँह पर चाँटा खाते रहने वाले गाँधीवादी हैं

ये कायरता का ना खेल हुआ होता
गद्दी पर सरदार पटेल हुआ होता
उग्रवाद की उम्र साँझ कर दी जाती
हर आतंकी कोख बाँझ कर दी जाती

मैं दरबारों की लाचारी को चाणक्य पढ़ाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

मुक्त रुबिया का हो जाना निर्णय ग़लत हुआ हमसे
और तभी पूरी घाटी धुंधलाई आतंकी तम से
हमने अपनी खुद्दारी के सही जलजले नहीं किये
और हमारे दरबारों ने लौह-फ़ैसले नहीं किये
अर्जुन मछली की आँखों पर तीर चलाना चूक गये
मुट्ठी भर जुगनू सूरज के ज्योति-कलश पर थूक गये

राजनीति ने अपनी ही सेना के बाजू तोड़ दिए
बारी-बारी समझौतों में ख़ूनी कातिल छोड़ दिये
जब सिंहासन का राजा ही कायर दिखने लगता है
तो पूरा मौसम हत्यारा डायर दिखने लगता है
आखिर यूँ झुकते-झुकते दुनिया से क्या ले लेंगे हम
कोई दिल्ली मांगेगा तो क्या दिल्ली दे देंगे हम

बंधकजन के परिजन भी सब खुदगर्जी में झूल गये
अपने रिश्ते याद रहे भारत माता को भूल गये
उनके हर परिजन ने कायर होने का आभास दिया
नहीं किसी ने त्याग-धर्म का दिल्ली को विश्वाश दिया
काश कि उनके परिवारों ने हिम्मत ना तोड़ी होती
हमने जग में देश-प्रेम की अमर कथा जोड़ी होती
आखिर उन परिवारों की भी कोई जिम्मेदारी थी
सच पूछो तो दिल्ली उनके परिवारों से हारी थी

क्या ये देश उन्हीं का है जो सीमा पर मर जाते हैं
अपना खून बहाकर टीका सरहद पर कर जाते हैं
ऐसा युद्ध वतन की खातिर सबको लड़ना पड़ता है
संकट की घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है
जो भी कौम वतन की खातिर मरने को तैयार नहीं
उसकी संतति को आजादी जीने का अधिकार नहीं

अब जग के दादाओं से डरना छोडो
और कराची से अपना नाता तोड़ो
अब एक और महाभारत लड़ना होगा
चक्र सुदर्शन लेकर के अड़ना होगा

मैं अर्जुन को श्रीकृष्ण की गीता याद दिलाता हूँ
इसीलिए मै केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

किसके कितने लाल सलोने सीमा पर छिन जाते हैं
गुरु गोविन्द जी बेटे दीवारों में चिन जाते हैं
झाँसी की रानी लड़कर रजधानी मिटवा देती है
पन्ना धाय वफ़ादारी में बेटा कटवा देती है
मंगल पांडे आजादी का परवाना हो जाता है
उधम डायर से बदले को दीवाना हो जाता है

घास-फूँस की रोटी खाकर राणा नहीं लड़े थे क्या
बन्दा बैरागी के सर पर हाथी नहीं चढ़े थे क्या
वीर हकीकत राय धर्म की खातिर मरते देखे हैं
ऋषि दधिची भी अपनी हड्डी अर्पण करते देखे हैं
हाड़ी रानी शीश काट कर थाली में रख देती है
ये गाथा उनको सूरज की लाली में रख देती है

जेल भरे क्यूँ बैठे हैं हम आदमखोर दरिंदों से
आजादी का दिल घायल है जिनके गोरखधंधों से
घाटी में आतंकवाद के कारक सिद्ध हुए हैं जो
बच्चों की मुस्कानों के संहारक सिद्ध हुए हैं जो
उन जहरीले नागो को भी दूध पिलाती है दिल्ली
मेहमानों जैसी बिरयानी-मटन खिलाती है दिल्ली

आज समय को उत्तर देना ही होगा सिंहासन को
चीरहरण की कौन इजाजत देता है दुशाशन को
न्याय-व्यवस्था निर्णय करने में मजबूर रही तो क्यों ?
इनकी गर्दन फाँसी के फंदों से दूर रही तो क्यों ?
जिनकी जहरीली साँसों में आतंकों की आँधी है
उनको जिन्दा रखने में दिल्ली असली अपराधी है

कानूनों की हथकड़ियों को कड़ा करो
इनको फाँसी के फंदों पर खड़ा करो
पागल कुत्ते की हत्या मजबूरी है
गद्दारों को फाँसी बहुत जरुरी है

मैं बजरंगबली को उनकी ताकत याद दिलाता हूँ
इसीलिए मै केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ


लोकतंत्र

लोकतंत्र जातियों की जंग में बदल दिया
मेहेंदियों का रंग ख़ूनी रंग में बदल दिया
जो घरों में ला रहे हैं जंगलों की आग को
और जो जगा रहे हैं जातियों के नाग को
जिनका है अतीत वैमनस्य के जूनून का
और सर पे पाप है पहाड़ियों के खून का
इस चमन में बुलबुलों के पंख नोचतें हैं जो
वे कोई बड़े खुदा हैं खुद ही सोचते हैं जो

जिनके यहाँ ख़ूनी दाग साफ़ किये जाते हैं
फाँसी वाले गुनाहगार माफ़ किये जाते हैं
जिसने गुण्डे हौंसलों को दी सदैव थपकियाँ
और हल्ला बोल-बोल दी कलम को धमकियाँ
जिसके राज में जली हैं प्रेस की भी होलियाँ
और भीड़ पर चली हैं बेशुमार गोलियाँ
जिसने टूट के कगार ला दिया समाज को
जो नहीं बचा सके हैं माँ बहन की लाज को

जिसके आस-पास गुण्डे तस्करों का जोर है
उनके हाथ में वतन की आज बागडोर है
मेरा वास्ता नहीं है कोई राजपाट से
इक सवाल पूछता हूँ रोज राजघाट से
मेरी नींद खो गयी हुजूर इस मलाल में
क्या वतन को मिलना था यही पचास साल में
कल जो घर से भागा किसी ज्ञान की तलाश में
करोड़ों की संपदा है आज उसके पास में

गोरैया के बच्चों को जला दिया है नीड़ ने
आस्थाएं तोड़ दी हैं साधुओं की भीड़ ने
पाखण्डी परम्परा है आन-बान-शान की
है करोड़ों की कमी मजहबी दुकान की
पूजा पाठ हो रहा है धन्ना सेठ के लिये
कोई यज्ञ होता नहीं भूखे पेट के लिये
भगवानों के चित्रों से भभूत झड़ी मिली है
साधुओं की देह हीरे मोती जड़ी मिली है

कोई स्वर्ग जाने हेतु दे रहा है सीढियाँ
कहीं भूत-प्रेतों से ही डर रही हैं पीढियाँ
कोई सुबह का उजाला रैन बना देता है
कोई चमत्कार स्वर्ण चैन बना देता है
कोई मन्त्र -सिद्धि की ही दे रहा है बूटियाँ
कोई हवा में ही बना देता है अंगूठियाँ
पर कोई गरीबों की लँगोटी न बना सका
कोई स्वामी संत बाबा रोटी न बना सका



बहुत सरल हूँ

कल तुम मेरा नाम पढ़ोगे इतिहासों के शिलालेख पर
जिनके पैरों में छाले हैं मै उनकी आँखों का जल हूँ |

मै पीड़ाओं का गायक हूँ
शब्दों का व्यापार नहीं हूँ
जंहा सभी चीजें बिकती हैं
मै ऐसा बाज़ार नहीं हूँ

मुझ पर प्रश्न चिन्ह मत थोपो कुंठित व्याकरनी पैमानो
मुझको रामकथा - सा पढ़िये बहुत सहज हूँ, बहुत सरल हूँ |

दरबारों कि मेहरबानियाँ
जड़ भी चतुर सुजान हो गए
जुगनू विरुदावलियाँ गाकर
साहित्यिक दिनमान हो गए

मै डरकर अभिनन्दन गाऊँ, इससे से अच्छा है मर जाऊं
मै सागर का क़र्ज़ चुकाने वाला आवारा बदल हूँ |

मैंने पगडण्डी नापी है
आपने पैरों हौले- हौले
मेरे दर से खाली लौटे
राजनीति के उड़नखटोले

राजभवन के कालीनों पर मेरे ठोकर चिन्ह मिलेंगे
मै आँसू का ताजमहल हूँ झोपड़ियों का राजमहल हूँ |

मेरा मोल लगाने बैठे हैं
कुछ लोग तिजोरी खोले
दुनिया में इतना धन कब है
जो मेरी खुद्दारी तोले.

जब से मुझको नील-कंठ्नी कलम विधाता ने सौंपी है
तन में चित्रकूट - वृन्दावन, मन में गंगा कि कलकल हूँ |




धीमी- धीमी चाल ये भूचाल न हो जाये,
हाथ कि कलम कहीं कुदाल न हो जाये
ये तिरंगा किसी का रुमाल न हो जाये
और व्यवस्था कहीं छिनाल न हो जाये

इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये

बचपनों के पालने अभाव में जले,
भूखी माँ कि आँसुओं कि गोद में पले
लाचारी कि गोद में पले हुए हैं जो
दर्दो-गम कि आग में जले हुए हैं जो

वे कहाँ पे जायें अब सुकून के लिये,
काम नहीं है जवान खून के लिये
भूखे पेट भूख में चिल्लाने लगें तो,
खाली हाथ पत्थर उठाने लगे तो

अरमानों का कुचलना जो नहीं रुका तो,
पत्थरों का उछलना जो नहीं रुका तो
दिल्ली के विचारों को बदलना पड़ेगा,
नौजवान खून को मचलना पड़ेगा

कसमसाने - सी लगी है ये वसुंधरा,
मुरझाने लगा है ये चमन हरा-भरा
खून के छींटें हैं भारती के भाल पर
मौत रो रही है हरिजनों के हाल पर

महलों के लिये तो चांदनी - कतार है,
शहीदों के मजारों पे अन्धकार है
भीड़-भाड़ वाली भीड़-भाड़ न हो जाये,
और माँ का चीर, चीर फाड़ न हो जाये

इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये

सामने जो ढहता हुआ सा मकान है,
अच्छी तरह देख लो यह संविधान है
ऐरे- गैरे नत्थू खैरे तंत्री हो गए
जिनको जेलों में होना था मंत्री हो गए

शासकों विरोधियों में फर्क क्या करें,
कोई फर्क ही नहीं है तर्क क्या करें
खून से रोपे अंगूर खट्टे हैं सभी,
एक थैली के ही चट्टे-बट्टे हैं सभी

नौकरशाही भी पाखंडी होने लगी है,
बदतमीजी भी रणचंडी होने लगी है
लालबहादुर कि राख ठंडी न हो जाये,
और संसद कहीं सब्जीमंडी न हो जाये

इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये

जिन्दा कौम झूठ कि जयकार क्यों करें,
भीगी आँखे सिंहासन को प्यार क्यों करें
पीड़ा पहरेदार है हमारे गाँव में,
भूख कि जंजीर है हमारे पाँव में

रोटी नहीं है हज़ार पेटों के लिये,
क्या हुआ है गरीबों के बेटों के लिये
भूखे-प्यासे रो रहे हैं पप्पू देश में,
करोड़ों में खेलता है अप्पू देश में

महलों के लिये भले गुनाह कीजिये
झोंपड़ी कि और भी निगाह कीजिये
होश और जोश में जता रहे हैं हम
और अपनी दिल्ली को बता रहे हैं हम

झोपडी का खून कोई पानी नहीं है,
राजधानी कोई महारानी नहीं है
बुलडोज़र ही देश का कानून न हो जाये,
कोई आतंकी भी अफलातून न हो जाये

इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये

देश का ईमान बेईमान हो गया,
आदमी मकान से दुकान हो गया
गर्म हवा गाँव-गाँव डोल रही है,
कोयल भी काँव-काँव बोल रही है

बाढ़ कि नदी में सब बहने लगे हैं,
साँझ के तारे को भोर कहने लगे हैं
न्याय कि व्यवस्था कि ये कैसी घड़ी है,
न्यायाधीश को भी गोली खानी पड़ी है

बेड़ियों से गुंडागर्दी छूट रही है,
पारा-पारा हो के धारा टूट रही है
सत्ता में जनता यकीन खोने लगी है,
डाकुओं कि ताजपोशी होने लगी है

राजनीति डाकुओं की सम्बल न हो जाये,
और मेरा पूरा देश चम्बल न हो जाये
इसलिए लिखेंगे इन्कलाब के लिये
और हम जलेंगे आफ़ताब के लिये





हाँ हुजूर मै चीख रहा हूँ

हाँ हुजूर मै चीख रहा हूँ
हाँ हुजूर मै चिल्लाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ

मेरा कोई गीत नहीं है किसी रूपसी के गालों पर
मैंने छंद लिखे हैं केवल नंगे पैरों के छालों पर
मैंने सदा सुनी है सिसकी मौन चांदनी की रातों में
छप्पर को मरते देखा है रिमझिम- रिमझिम बरसातों में

आहों कि अभिव्यक्ति रहा हूँ
कविता में नारे गाता हूँ
मै सच्चे शब्दों का दर्पण
संसद को भी दिखलाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ

अवसादों के अभियानों से वातावरण पड़ा है घायल
वे लिखते हैं गजरे, कजरे, शबनम, सरगम, मेंहदी, पायल
वे अभिसार पढ़ाने बैठे हैं पीड़ा के सन्यासी को
मैं कैसे साहित्य समझ लूँ कुछ शब्दों कि अय्याशी को

मै भाषा में बदतमीज हूँ
अलंकार को ठुकराता हूँ
और गीत के व्यकरानो के
आकर्षण से कतराता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ

दिन ढलते ही जिन्हें लुभाएँ वेशालय औ' मधुशालाएँ
माँ वाणी के अपराधी हैं चाहे महाकवि ही कहलायें
अपराधों की अभिलाषाएं मौन चाँदनी कि मस्ती में
जैसे कोई फूल बेचता हो भूखी-नंगी बस्ती में

मैं शब्दों को बजा-बजा कर
घुंघुरू नहीं बना पता हूँ
मै तो पांचजन्य का गर्जन
जनगण-मन तक पहुँचाता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ

जिनके गीतों कि जननी है महबूबा कि हँसी- उदासी
उनको रास नहीं आ सकते ऊधमसिंह औ' रानी झाँसी
मुझसे ज्यादा मत खुलवाओ इन सिद्धों के आवरणों को
इससे तो अच्छा है पढ़ लो तुम गिद्धों के आचरणों को

मै अपनी कविता के तन पर
गजरे नहीं सजा पता हूँ
अमर शहीदों कि यादों से
मै कविता को महकता हूँ
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूँ





मैंने क्यूँ गाये हैं नारे

मैंने जो कुछ भी गाया है तुम उसको नारे बतलाओ
मुझे कोई परवाह नहीं है मुझको नारेबाज बताओ
लेकिन मेरी मजबूरी को तुमने कब समझा है प्यारे |
लो तुमको बतला देता हूँ मैंने क्यूँ गाये हैं नारे ||

जब दामन बेदाग न हो जी
अंगारों में आग न हो जी
घूँट खून के पीना हो जी
जिस्म बेचकर जीना हो जी
मेहनतकश मजदूरों का भी
जब बदनाम पसीना हो जी
जनता सुना रही हो नारे
संसद भुना रही हो नारे
गम का अँगना दर्द बुहारे
भूखा बचपन चाँद निहारे
कोयल गाना भूल रही हो
ममता फाँसी झूल रही हो
मावस के डर से भय खाकर,
पूनम चीख़े और पुकारे
हो जाएँ अधिकार तुम्हारे
रह जाएँ कर्तव्य हमारे
छोड़ - छाड़ जीवन-दर्शन को तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||

निर्वाचन लड़ते हैं नारे
चांटे से जड़ते हैं नारे
सत्ता की दस्तक हैं नारे
कुर्सी का मस्तक हैं नारे
गाँव-गली, शहरों में नारे,
सागर की लहरों में नारे
केसर की क्यारी में नारे
घर की फुलवारी में नारे
सर पर खड़े हुए हैं नारे,
दाएँ अड़े हुए हैं नारे
नारों के नीचे हैं नारे
नारों के पीछे हैं नारे
जब नारों को रोज पचाने
को खाने पड़ते हों नारे
इन नारों से जान बचाने
को लाने पड़ते हों नारे
छोड़ गीत के सम्मोहन को तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||

जब चन्दामामा रोता हो
सूरज अँधियारा बोता हो
जीवन सूली-सा हो जाये,
गाजर-मूली सा हो जाये,
पूरब ज़ार-ज़ार हो जाये
पश्चिम को आरक्षण खाए
उत्तर का अलगावी स्वर हो
दक्षिण में भाषा का ज्वर हो
अपने बेगाने हो जायें
घर में ही काँटे बो जायें,
मानचित्र को काट रहे हों
भारत माँ को बाँट रहे हों
ग़ैर तिरंगा फाड़ रहे हों
अपने झण्डे गाड़ रहे हों,
जब सीने पर ही आ बैठें
भारत माता के हत्यारे
छोड़ - छाड़कर सूर-कबीरा तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||

कलियाँ खिलने से घबरायें
भौंरे आवारा हो जायें
फूल खिले हों पर उदास हों,
पहरे उनके आस-पास हों
पायल सहम-सहम कर नाचे,
पाखण्डी रामायण बाँचे
कूटनीति में सब चलता हो,
मर्यादा का मन जलता हो
उल्लू गुलशन का माली हो
पहरेदारी भी जाली हो
संयम मौन साध बैठा हो
झूठ कुर्सियों पर ऐंठा हो
चापलूस हों दरबारों में,
ख़ुद्दारी हो मझ्धारों में
बलिदानी हों हारे-हारे,
डाकू भी लगते हों प्यारे
छोड़ चरित्रों की रामायण तब लिखने पड़ते हैं नारे |
इसीलिए गाता हूँ नारे इसीलिए लिखता हूँ नारे ||





सारे जहाँ से अच्छा

जहाँ सुरक्षाकर्मी जब जिसको चाहे कर दें अंधा
और पुलिसे के थाने ऐसे, जैसे गुंडों का धंधा
मुठभेड़ों के नाम पे हत्या होती है निर्दोषों की
चौराहों की मर्यादा है ठोकर में मदहोशों की
जहाँ वर्दियों की बाँहों में अबला की चीखें गुम हैं
गाँधी की नैतिकता वाली आँखों के आगे तम हैं
भारत गाँधी के सपनो का कातिल है हत्यारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!

गर्मी, सर्दी, बरसातों में निर्धन मर जाये तो क्या
आमों की गुठली के आटे की रोटी खाये तो क्या
आदिवासियों की मजबूरी पेड़ों की पत्ती खायें
झोपड़ियों में पैदा होकर फुटपाथों पर मर जायें
हमने अपनी झोपड़ियों के आँगन भूख सहेजी है
लेकिन अपनी कला नाचने अमेरिका में भेजी है
जो भूखों से भीख मांग ले भारत वो बंजारा है !
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!

ख़ूनी दंगों के जंगल ही जंगल जिसके आँगन में
लाखों चोटें खायें बैठा है जो अपने दामन में
जिसके पूजाघर शामिल हैं होड़ों में हथियारों की
ईंटें भी रोती होंगी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों की
जिसका रोज तिरंगा अपने लोहू में सन जाता है
बेटे का पिस्टल माँ के ही सीने पर तन जाता है
भगतसिंह की धरती पर भी खालिस्तानी नारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!

कफ़न-खसोटे तक भी हमसे बेशर्मी में हार गये
भारत के मुर्दे भी बिक-बिक कर सीमा के पार गये
हमने आडम्बर ओढ़ा है धर्म-कर्म के सायों का
पर दुनिया वालों के आगे माँस परोसा गायों का
यहाँ पुजारी भी बैठे हैं आँखों में नाखून लिये
और ब्रह्मचारी फिरते हैं जेबों में कानून लिये
राम तुम्हारी गंगा मैली गंगाजल भी खारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!

जहाँ अभी भी मानव की बलि रोज चढ़ाई जाती है
पत्थर की मूरत भी लोहू से नहलाई जाती है
जुबाँ कली की, घूँघट उठने से पहले सिल जाती है
इस भारत में दूध नहीं मिलता, मदिरा मिल जाती है
यहाँ रोज लाशें बनती हैं दुल्हन बिना दहेजों की
और रोज संख्या बढ़ जाती है आवारा सेजों की
बेबस नोची हुई कली का चकला यहाँ सहारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!

यहाँ बुद्धि तोली जाती है जाति-सने आधारों से
सत्ता की नैया चलती है आरक्षित पतवारों से
कूटनीतियाँ तोड़ रही हैं निर्धन की खुद्दारी को
और योग्यता झेल रही है कुर्सी की गद्दारी को
यहाँ परीक्षा से पहले परिणाम सुरक्षित होता है
मिट्टी के माधो का भी सम्मान सुरक्षित होता है
आरक्षण-कानून वतन की प्रतिभा का हत्यारा है!
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा है!!

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