Friday, April 23, 2010

दहेज

सुन्दर थी सुाील थी, हर अर्थ में न्यारी थी।
गरीब की सयानी बेटी, फिर भी कुॅआरी थी॥
मिला भी था एक वर,मॉग उसकी भारी थी।
मागों की यह बेडी, गरीब ही लाचारी थी॥
टी0वी0 फ्रिज स्कूटर देकर, मांग उसकी भरी थी।
खुद हो गये बेघर पर, डोली घर से उठी थी॥
दो माह बाद मिली बेटी बाबुल से कुछ नहीं बोली थी ।
उसकी हालत बोलती, थी दहेज में कुछ कमी थी ॥
जान के अंजान बना, बाबुल की कमजोरी थी।
मिली दोबारा बेटी जब, चिर निन्द्रा लेती लोरी थी ॥
हॉ मॉग उसकी भरी थी, सिन्दूर से व सजी थी।
चारों तरफ भाोर था, सुहागिन ही मरी थी॥

Thursday, April 22, 2010

आतंकी अफज़ल को माफ़ी .
हिन्दू साध्वी को फाँसी .
बजरंग दल पर प्रतिबन्ध .
सिमी के साथ अनुबंध .
अमरनाथ यात्रा पर लगान .
हज के लिए अनुदान .
रामसेतु के अस्तित्व पैर सवाल .
चुर्च और मस्जिदों का रखे पूरा खियाल .
साध्वी प्रज्ञा का बार -बार नार्को टेस्ट .
पाकिस्तानी आतंकी को देते रेस्ट .
आसाम में बांग्लादेशियों को राशन + आई -CARD.
कश्मीर में हिन्दुओं को रेड CARD.
कब तक हिन्दू अपमानित रहेगा .
कब तक अपनों के बिचार्ने का गम सहेगा .
याचना नहीं अब रन होगा !
जीवन जय या की मरण होगा

दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। पुराणों में उसका वर्णन है – उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है। ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।

मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है। शक्ति, संघटन की एकता में ही है। हमारी कथाओं में देवी दुर्गा का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं। यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं। साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।

दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है? शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई। यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं। आइये नजर डाले उन किस्से कहानियों पर, उस कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्होने महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और कुछ हद्द तक महिलाओं को दुर्गा का रूप दिया पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।

महिला दिवस (women’s day)

अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।

१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

महिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द लैंगिक न्याय (Gender Justice) प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। आइये समझें कि हमारे देश इस समय यह किस अर्थ में लिया जाता है।

लैंगिक न्याय (Gender Justice)

लैंगिक न्याय अर्थात किसी के साथ लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होना चाहिये। बहुत से लोग समलैंगिक अधिकारों को भी इसके अन्दर मानते हैं। समलैगिंकों के साथ भेदभाव होता है लेकिन वह इसलिये नहीं कि उनका लिंग क्या है वह इसलिये कि वे अपने लिंग के ही लोगों में रूचि रखते हैं। मेरे विचार से, समलैंगिग अधिकारों को लैंगिक न्याय के अन्दर रखना उचित नहीं है। उनके अधिकारों को अलग से नाम देना, या अल्पसंख्यक (Minority) या जातीय (ethnic) अधिकारों के अन्दर रखना, या Gay rights कहना ठीक होगा।

हम कुछ अन्य श्रेणी के व्यक्तियों के अदिकारों पर भी विचार करें, उदाहरणार्थः

  1. Trans- Sexual: यह वह लोग हैं जो एक लिंग के होते हैं पर बर्ताव दूसरे लिंग के व्यक्तियों की तरह से करते हैं;
  2. Trans gendered: लिंग परिवर्तित: यह वह व्यक्ति हैं जो आपरेशन करा कर अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इसमें सबसे चर्चित व्यक्ति रहे रीनी रिचर्डस्। ये पुरुष थे और आपरेशन करा कर महिला बन गये, पर उन्हें महिलाओं की टेनिस प्रतियोगिता में कभी भी खेलने नहीं दिया गया। उन्हें कुछ सम्मान तब मिला जब वे मार्टीना नवरोतिलोवा की कोच बनीं। मैंने इस तरह के लोगों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री कि चिट्ठी पर लिखा है;
  3. Inter-Sex बीच के: लिंग डिजिटल नहीं है। मानव जाति को केवल पुरूष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं। हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम (chromosome) तय करते हैं। यह जोड़े में आते हैं। हम में क्रोमोसोम के २३ जोड़े रहते हैं। हम पुरूष हैं या स्त्री, यह २३वें जोड़े पर निर्भर करता है। महिलाओं में यह दोनों बड़े अर्थात XX होते हैं पुरूषों में एक बड़ा एक छोटा यानि कि XY रहते हैं। अक्सर प्रकृति अजीब खेल खेलती है। कुछ व्यक्तियों में २३वें क्रोमोसोम जोड़े में नहीं होते: कभी यह तीन या केवल एक होते हैं अर्थात XX,Yया XYY, या X, या Y. यह लोग पूर्ण पुरूष या स्त्री तो नहीं कहे जा सकते – शायद बीच के हैं। इसलिए इन्हें Inter-Sex कहा जाता है। संथी सुन्दराजन शायद इसी प्रकार की हैं। इसलिये दोहा एशियाई खेलो में, उनसे रजत पदक वापस ले लिया गया।

ऊपर वर्णित तीनो तरह के व्यक्तियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव होता है। अधिकतर जगह, यह लोग हास्य के पात्र बनते हैं। इन्हें भी न्याय पाने का अधिकार है। पर अपने देश में लैंगिक न्याय का प्रयोग केवल महिलाओं के साथ न्याय के संदर्भ में किया जाता है और हम बात करेंगे महिलाओं के साथ न्याय, उनके सशक्तिकरण की: आज की दुर्गा की।

संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज

हमारे संविधान का अनुच्छेद १५(१), लिंग के आधार पर भेदभाव करना प्रतिबन्धित करता है पर अनुच्छेद १५ (२) महिलाओं और बच्चों के लिये अलग नियम बनाने की अनुमति देता है। यहीं कारण है कि महिलाओं और बच्चों को हमेशा वरीयता दी जा सकती है।

संविधान में ७३वें और ७४वें संशोधन के द्वारा स्थानीय निकायों को स्वायत्तशासी मान्यता दी गयी । इसमें यह भी बताया गया कि इन निकायों का किस किस प्रकार से गठन किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद २४३-डी और २४३-टी के अंतर्गत, इन निकायों के सदस्यों एवं उनके प्रमुखों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित की गयीं हैं। यह सच है कि इस समय इसमें चुनी महिलाओं का काम, अक्सर उनके पति ही करते हैं पर शायद एक दशक बाद यह दृश्य बदल जाय।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। हमारे देश में इसका प्रयोग उस तरह से नही किया जा रहा है जिस तरह से किया जाना चाहिये। अभी उपभोक्ताओं में और जागरूकता चाहिये। इसके अन्दर हर जिले में उपभोक्ता मंच (District Consumer Forum) का गठन किया गया है। इसमें कम से कम एक महिला सदस्य होना अनिवार्य है {(धारा १०(१)(सी), १६(१)(बी) और २०(१)(बी)}।

परिवार न्यायालय अधिनियम के अन्दर परिवार न्यायालय का गठन किया गया है। पारिवारिक विवाद के मुकदमें इसी न्यायालय के अन्दर चलते हैं। इस अधिनियम की धारा ४(४)(बी) के अंतर्गत, न्यायालय में न्यायगण की नियुक्ति करते समय, महिलाओं को वरीयता दी गयी है।

अंर्तरार्ष्टीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Convention of Elimination of Discrimination Against Women (CEDAW) (सीडॉ) है। सन १९७९ में, संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पुष्टि की। हमने भी इसके अनुच्छेद ५(क), १६(१), १६(२), और २९ को छोड़, बाकी सारे अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया है। संविधान के अनुच्छेद ५१ के अंतर्गत न्यायालय अपना फैसला देते समय या विधायिका कानून बनाते समय, अंतर्राष्ट्रीय संधि (Treaty) का सहारा ले सकते हैं। इस लेख में आगे कुछ उन फैसलों और कानूनों की चर्चा रहेगी जिसमें सीडॉ का सहारा लिया गया है।

व्यक्ति शब्द पर ६० साल का विवाद

भूमिका
हमारा समाज पुरुष प्रधान है। इसके मानक पुरुषों के अनुरूप रहते हैं। तटस्थ मानकों की भी व्याख्या, पुरुषों के अनुकूल हो जाती है। कानून में हमेशा माना जाता है कि जब तक कोई खास बात न हो तब तक पुलिंग में, स्त्री लिंग सम्मिलित माना जायेगा। कानून में कभी कभी पुलिंग, पर अधिकतर तटस्थ शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जैसे कि ‘व्यक्ति’। अक्सर कानून कहता है कि, यदि किसी ‘व्यक्ति’ (person),

  • की उम्र ….. साल है तो वह वोट दे सकता है,
  • ने —- साल ट्रेनिंग ले रखी है तो वह वकील बन सकता है,
  • ने विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की है तो वह उसके विद्या परिषद (Academic council) का सदस्य बन सकता है,

को गवर्नर जनरल, सेनेट का सदस्य नामांकित कर सकता है।

ऐसे कानून पर अमल करते समय, अक्सर यह सवाल उठा करता था कि इसमें ‘व्यक्ति’ शब्द की क्या व्याख्या है। इसके अन्दर हमेशा पुरूषों को ही व्यक्ति माना गया, महिलाओं को नहीं। यह भी अजीब बात है। भाषा, प्रकृति तो महिलाओं को व्यक्ति मानती है पर कानून नहीं। महिलाओं को, अपने आपको, कानून में व्यक्ति मनवाने के लिए ६० साल की लड़ाई लड़नी पड़ी और यह लड़ाई शुरू हुई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से।

व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय

इस बारे में सबसे पहला प्रकाशित निर्णय Chorlton Vs. Lings (१८६९) का है । इस केस में कानून में पुरूष शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय और इस समय भी, इंगलैंड में यह नियम था कि पुलिंग में, स्त्री लिंग भी शामिल है। इसके बावजूद यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियां को वोट देने का अधिकार नहीं है। इंगलैण्ड के न्यायालयों में इसी तरह के फैसले होते रहे जिसमें न केवल पुरूष ब्लकि व्यक्ति शब्द की व्याख्या करते समय, महिलाओं को इसमें सम्मिलित नहीं माना गया। जहां व्यक्ति शब्द का भी प्रयोग किया गया था वहां भी महिलाओं को व्यक्ति में शामिल नहीं माना गया। इन मुकदमों में Bressford Hope Vs. Lady Sandhurst (1889), Ball Vs. Incorp, society of Law Agents (1901) उल्लेखनीय है । 1906 में इंगलैण्ड की सबसे बड़ी अदालत हाउस आफ लॉर्डस ने Nairn Vs. Scottish University में यही मत दिया। यही विचार वहीं की अपीली न्यायालय ने Benn Vs. Law Society (१९१४) में व्यक्त किये।

इंगलैंड में यही क्रम जारी रहा। इन न्यायालयों में लड़ाई के अतिरिक्त वहां समाज में भी यह मांग उठी कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिले। भारत के पूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन भी महिलाओं को वोट का अधिकार देने के विरोधी खेमी में थे। उनका तो यहां तक कहना था कि यदि भारत के लोगों को पता चलेगा कि इंगलैण्ड की सरकार महिलाओं के वोट पर बनी है तो भारतवासी उस सरकार पर वह विश्वास करना छोड़ देगें। इंगलैंण्ड में महिलायें वोट देने के अधिकार से १९१८ तक वंचित रहीं। उन्हें इसी साल कानून के द्वारा वोट देने का अधिकार मिला। इंगलैण्ड में स्त्रियों के साथ बाकी भेदभाव लैंगिक अयोग्यता को हटाने के लिए १९१९ में बने अधिनियम से हटा।

व्यक्ति शब्द पर अमेरिका में कुछ निर्णय

अमेरिका तथा अन्य देशों में व्यक्ति शब्द की व्याख्या का इतिहास कुछ अलग नहीं था। अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने Bradwell Vs. Illinois (१८७३) में व्यवस्था दी है कि विवाहित महिलायें व्यक्ति की श्रेणी में नहीं हैं और वकालत नहीं कर सकतीं। इसके दो वर्ष बाद ही Minor Vs. Happier Sett के केस में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने यह तो माना कि महिलाएं नागरिक हैं पर यह भी कहा कि वे विशेष श्रेणी की नागरिक हैं और उन्हें मत डालने का अधिकार नहीं हैं। अमेरिका में २१ वर्ष से ऊपर की महिलाओं को मत देने की अनुमति अमेरिकी संविधान के १९वें संशोधन (१९२०) के द्वारा ही मिल पायी।

व्यक्ति शब्द पर दक्षिण अफ्रीका में कुछ निर्णय

इस विवाद के परिपेक्ष में, दक्षिण अफ्रीका का जिक्र करना जरूरी है। यहां पर इस तरह के पहले मुकदमे Schle Vs. Incoroporated Law Society (1909) , में महिलाओं को व्यक्ति शब्द में नहीं शामिल किया गया और उन्हें वकील बनने का हकदार नहीं माना गया। पर केपटाउन की न्यायालय ने १९१२ में माना कि महिलाएं ‘व्यक्ति’ शब्द में शामिल हैं और वकील बनने की हकदार हैं। कहा जाता है कि इस तरह का यह एक पहला फैसला था। लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चला। यह निर्णय अपीलीय न्यायालय द्वारा Incorporated Law Society Vs. Wookey (1912) में रद्द कर दिया गया । इस अपीलीय न्यायालय के फैसले का आधार यही था कि महिलाएं व्यक्ति शब्द की व्याख्या में नहीं आती हैं।

व्यक्ति शब्द पर विवाद का अन्त

इस विवाद का अन्त कनाडा के एक मुकदमे Edwards Vs. Attorney General में हुआ। कनाडा के गर्वनर जनरल को सेनेट में किसी व्यक्ति को नामांकित करने का अधिकार था। सवाल उठा कि क्या वे किसी महिला को नामांकित कर सकते हैं। कैनाडा के उच्चतम न्यायालय ने सर्व सम्मति से निर्णय लिया कि महिलायें व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं। इसलिये वे नामित नहीं हो सकती हैं। इस फैसले के खिलाफ अपील में, प्रिवी कांऊसिल ने स्पष्ट किया है कि, ‘व्यक्ति शब्द में स्त्री-पुरूष दोनों हो सकतें हैं और यदि कोई कहता है कि व्यक्ति शब्द में स्त्रियों को क्यों शामिल किया जाय तो जवाब है कि “क्यों नहीं”?’ लेकिन यह वर्ष १९२९ में हुआ। आइये देखें कि अपने देश में क्या हुआ।

व्यक्ति शब्द पर भारतीय में कुछ निर्णय: कलकत्ता और पटना उच्च न्यायालय

अपने देश में भी ‘व्यक्ति’ शब्द की व्याख्या करने वाले मुकदमे हुए हैं। पहले वकील नामांकित करने का काम उच्च न्यायालय करता था। अब यह काम बार कौंसिल करती है। वकील नामांकित करन के लिए लीगल प्रैक्टिशनर अधिनियम हुआ करता था इसमें ‘व्यक्ति’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था। महिलाओं ने इसी अधिनियम के अन्दर वकील बनने के लिए कलकत्ता एवं पटना उच्च न्यायालयों में आवेदन पत्र दिया। कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्यायमूर्ति की पूर्ण पीठ ने १९१६ में {In re Reging Guha (ILR 44 Calcutta 290= 35 IC 925)} तथा पटना उच्च न्यायालय की तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ ने १९२१ में {In re Sudhansu Bala Mazra (A.I.R. 1922 Patna 269) } ने निर्णय दिया कि महिलाएं व्यक्ति शब्द में शामिल नहीं हैं और उनके आवेदन को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद यह प्रश्न नहीं उठा क्योंकि १९२३ में The Legal Practitioners (Women) Act के द्वारा महिलाओं के खिलाफ इस भेदभाव को दूर कर दिया गया। पर क्या किसी उच्च न्यायालय ने महिलाओं के पुराने कानून में व्यक्ति होना माना। जी हां-वह है इलाहाबाद उच्च न्यायालय।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय – क्रॉर्नीलिआ सोरबजी (Cornelia Sorabjee)

क्रॉर्नीलिआ सोरबजी, एक पारसी महिला थीं। उनका भाई बैरिस्टर था और वह इलाहाबाद वकालत करने आया। वह उसी के साथ उसके घर का रख-रखाव करने आयीं। उन्हें वकालत का पेशा अच्छा लगा और उन्होंने वकालत करने की ठानी। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने अपना आवेदन पत्र वकील बनने के लिये दिया जो पहले खारिज कर दिया गया पर उनका १ अगस्त १९२१ को वकील की तरह नामित करने के लिये दिया गया आवेदन पत्र, ९ अगस्त १९२१ में स्वीकार हुआ। यह नामांकन उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक में हुआ था इसलिए यह प्रकाशित नहीं है पर पटना उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये फैसले में इसका तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ कुछ इस तरह से उल्लिखित है।

क्रॉर्नीलिआ सोरबजी ‘व्यक्ति’ शब्द के अन्दर नामांकित होने वाली भारत की ही पहली महिला नहीं, बल्कि व्यक्ति खण्ड के अधीन दुनिया में कहीं भी नामांकित होने वाली पहली महिला थीं। दक्षिण अफ्रीका का मात्र एक पहला मुकदमा ज्यादा दिन तक नहीं चला। वह उसी वर्ष निरस्त कर दिया गया । क्रोनीलिआ से पहले भी कई महिलायें नामांकित हुई हैं लेकिन वे विशेष कानून की वजह से हुआ था जिसमें महिलाओं को वकील बनने का अलग से अधिकार दिया गया था।


सुश्री सुपर्णा गुप्तू (Suparna Gooptu) ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी की जीवनी Cornelia Sorabjee – India’s Pioneer Woman lawyer नाम से लिखी है इसे Oxford University Press ने प्रकाशित किया है। इसमें वे कहती हैं कि क्रॉर्नीलिआ सोरबजी समाज सेविका तो थी पर वे अंग्रेजी हूकूमत की समर्थक भी थी। इस पुस्तक में लिखा है कि वे ३० अगस्त को १९२१ को नामांकित की गयी थीं तथा यहां लिखा है कि वे २४ अगस्त को नामांकित की गयी थीं पर शायद दोनो बात सही नहीं हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इंगलिश (प्रशासनिक) बैठक जिसमें उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया गया वह ९ अगस्त १९२१ को हुई थी पर उच्च न्यायालय ने क्रॉर्नीलिआ सोरबजी को इस बात के लिये पत्र दिन्नाक ३० अगस्त १९२१ को भेजा था। यह तारीख महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि चाहे जो भी तारीख हो वे इस तरह की पहली महिला थीं।

स्वीय विधी (Personal Law)

लिंग के आधार पर सबसे ज्यादा भेद-भाव Personal Law में दिखाई देता है और इस भेदभाव को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है कि समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code) बनाया जाय।

हमारे संविधान का भाग चार का शीर्षक है – ‘राज्य की नीति के निदेशक तत्व’ (Directive Principles of the State policy)। इसके अंतर्गत रखे गये सिद्घान्त, न्यायालय द्वारा क्रियान्वित (Enforce) नहीं किये जा सकते हैं पर देश को चलाने में उन पर ध्यान रखना आवश्यक है । अनुच्छेद ४४ इसी भाग में है। यह अनुच्छेद कहता है कि हमारे देश में समान सिविल संहिता बनायी जाय पर इस पर पूरी तरह से अमल नहीं हो रहा है।

हमारे संविधान के भाग तीन का शीर्षक है – मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)। इनका क्रियान्वन (enforcement) न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। इस समय न्यायपालिका के द्वारा मौलिक अधिकारों और राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में संयोजन हो रहा है। न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की व्याख्या करते हुये राज्य की नीति के निदेशक तत्वों की सहायता ले रहे हैं। बहुत सारे लोग न्यायालयों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह देश में समान सिविल संहिता के लिये बड़ा कदम उठाए। उनके मुताबिक:

  • संविधान के अनुच्छेद १३ के अंतर्गत स्वीय विधि (Personal Law) और किसी दूसरे कानून में कोई अन्तर नहीं है। यदि स्वीय विधि (Personal Law) में भेदभाव है तो न्यायालय उसे अनुच्छेद १३ शून्य घोषित कर सकता है।
  • स्वीय विधि, संविधान के अनुच्छेद १४ तथा १५ का उल्लंघन करते हैं और उन्हें निष्प्रभावी घोषित किया जाना चाहिये।
  • संसद, राजनैतिक कारणों से इस बारे में कोई कानून नहीं बना पा रही है इसलिये न्यायालय को आगे आना चाहिये।

न्यायपालिका ने इस दिशा में एक और कदम Sarla Mudgal Vs. Union of India वा Madhu Kishwar Vs. State of Bihar में उठाया था पर इस कदम को Ahmedabad Women Action Group (AWAG) Vs. Union of India में यह कहते हुये वापस ले लिया कि,

‘ यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है जिससे सामान्यत: न्यायालय का कोई संबंध नही रहता है। इसका हल कहीं और है न कि न्यायालय के दरवाजे खटखटाने पर।’

न्यायपालिका आगे क्या करेगी – यह तो भविष्य ही बतायेगा पर शायद पहल उन महिलाओं को करनी पड़ेगी जो इस तरह के भेदभाव वाले स्वीय विधि से प्रभावित होती हैं।

यदि न्यायालयों के निर्णयों को आप देंखे तो पायेंगे कि न्यायपालिका किसी भी स्वीय विधि (Personal Law) को निष्प्रभावी घोषित करने में हिचकिचाती है लेकिन उस कानून की व्याख्या करते समय वह महिलाओं के पक्ष में रहता है। यही कारण है कि अपवाद को छोड़कर न्यायालयों ने कानून की व्याख्या करते समय, उसे महिलाओं के पक्ष में परिभाषित किया। इसके लिये चाहे उन्हें कानून के स्वाभाविक अर्थ से हटना पड़े। यह बात सबसे स्पष्ट रूप से Danial Latif Vs Union of India के फैसले से पता चलती है। इस मुकदमे में मुस्लिम स्त्री (विवाह-विच्छेद पर अधिकारों का समक्षण) अधिनियम १९८६ {Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act 1986} की वैधता को चुनौती दी गयी थी।

महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता (maintenance)

अधिकतर धर्मों के लिये स्वीय कानून (Personal Law) अलग-अलग है। अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के भरण-पोषण भत्ता की अधिकारों की सीमा भी अलग-अलग है पर यह अलगाव अब टूट रहा है।

Indian Divorce Act ईसाइयों पर लागू होता है। इसकी धारा ३६ में यह कहा गया है कि मुकदमे के दौरान पत्नी को, पति की आय का १/५ भाग भरण-पोषण भत्ता दिया जाय। पहले, अक्सर न्यायालय न केवल मुकदमा चलने के दौरान, बल्कि समाप्त होने के बाद भी १/५ भाग भरण-पोषण के लिए पत्नी को दिया करते हैं। यह सीमा न केवल ईसाईयों पर बल्कि सब धर्मों पर लगती थी। इस समय यह समीकरण बदल गया है और कम से कम पति की आय का १/३ भाग पत्नी को भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है। यदि पत्नी के साथ बच्चे भी रह रहे हों तो उसे और अधिक भरण-पोषण भत्ता दिया जाता है।

पत्नी को भरण-पोषण भत्ता प्राप्त करने के दफा फौजदारी की धारा १२५ में भी प्रावधान है। इस धारा की सबसे अच्छी बात यह थी कि यह हर धर्म पर बराबर तरह से लागू होती थी। वर्ष १९८५ में शाहबानो का केस आया। इसमें उसके वकील पति ने शाहबानो को तलाक दे दिया। उसे मेहर देकर, केवल इद्दत के दोरान ही भरण-पोषण भत्ता दिया पर आगे नहीं दिया। शाहबानो ने फौजदारी की धारा १२५ के अंतर्गत एक आवेदन पत्र दिया। १९८५ में उच्चतम न्यायालय द्वारा Mohammad Ahmad Kher Vs. Shahbano Begum में यह फैसला दिया कि यदि मुसलमान पत्नी, अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पा रही है तो मुसलमान पति को इद्दत के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना होगा।

शाहबानो के फैसले का मुसलमानों के विरोध किया। इस पर संसद ने एक नया अधिनियम मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद संरक्षण अधिनियम Muslim Women (Protection of Rights on Divorce Divorce Act) 1986 बनाया। इसको पढ़ने से लगता है कि यदि मुसलमान पति, अपनी पत्नी को मेहर दे देता है तो इद्दत की अवधि के बाद भरण-पोषण भत्ता देने का दायित्व नहीं होगा। यह कानून मुसलमान महिलाओं के अधिकार को पीछे ले जाता था। इस अधिनियम की वैधता को एक लोकहित जन याचिका के द्वारा चुनौती दी गयी। वर्ष २००१ में Dannial Latif Vs. Union of India के मुकदमें में उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम को अवैध घोषित करने से तो मना करा दिया पर इस अधिनियम के स्वाभाविक अर्थ को नहीं माना। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अधिनियम के आने के बावजूद भी यदि पत्नी अपनी जीविकोपार्जन नहीं कर पाती है तो मुसलमान पति को इद्दत की अवधि के बाद भी भरण-पोषण भत्ता देना पड़ेगा। अर्थात इस अधिनियम को शून्य तो नहीं कहा पर इसे निष्प्रभावी कर दिया। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के सम्बन्ध में अच्छे फैसलों में से एक है।

Alimony – Patrimony
शादी शुदा व्यक्तियों के सम्बन्ध विच्छेद होने पर जो पैसा दिया जाता है, उसे Alimony कहते हैं। अक्सर महिला-पुरूष बिना शादी किये साथ रहते है। ऎसे लोगों के लिए इंगलैण्ड में एक नया शब्द निकाला गया Common Law Wife, और Common Law Husband। लार्ड डैनिंग, २०वीं शताब्दी के एक जाने माने इंगलैण्ड के न्यायाधीश थे। उन्होंने १९७९ में डेवीस़ बनाम जॉनसन के मुकदमे में इस प्रकार से समझाया है,


अथार्त, कॉमन लॉ के अंतरगत इस तरह की कोई भी महिला नहीं जानी जाती थी पर इस का अर्थ उस महिला से है जो कि किसी पुरुष के साथ, एक ही घर में, पत्नी की तरह रहती है। यह रिश्ता रखैल के रिश्ते से अलग है जो कि अक्सर सामयिक, अस्थायी और गुप्त होता है।

अमेरिका के कई राज्यों में इस तरह के रहने को कानूनन नहीं माना गया फिर भी वहां लोग बिना शादी किये रहते हैं। अक्सर वे लोग भी साथ रहते हैं जो कि आपस में शादी नहीं कर सकते। उदाहरणार्थ,

  • एक पति या पत्नी रहते दूसरे के साथ शादी करना ; या
  • वह महिला और पुरूष जो करीबी रिश्तेदार होने के कारण कानूनन शादी नहीं कर सकते; या
  • दो एक ही लिंग के लोग। एक ही लिंग के लोगों के बीच की शादी या साथ रहने की मान्यता, केवल कुछ ही देशों में है। हमारे देश में नहीं है।

ऐसे व्यक्तियों के लिए Partners शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। यह लोग भी कभी-कभी अलग हो जाते हैं तब सवाल उठता है कि इसमें से किसी एक को भरण-पोषण भत्ता मिलना चाहिए या नहीं। इन Partners के बीच में दिया गया पैसा या भरण-पोषण भत्ते को patrimony कहा जाता है।

अपने देश में Patrimony – घरेलू हिंसा अधिनियम
हमारे देश में दो एक ही लिंग के व्यक्ति साथ नहीं रह सकते हैं और न उन्हें कोई कानूनन मान्यता या भरण-पोषण भत्ता दिया जा सकता है।

यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या किसी महिला को, उस पुरुष से, भरण-पोषण भत्ता मिल सकता है जिसके साथ वह पत्नी की तरह रह रही हो जब,

  • उन्होने शादी न की हो; या
  • वे शादी नहीं कर सकते हों।

पत्नी का अर्थ केवल कानूनी पत्नी ही होता है। इसलिए न्यायालयों ने इस तरह की महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता दिलवाने से मना कर दिया। अब यह सब बदल गया है।

संसद ने, सीडॉ के प्रति हमारी बाध्यता को मद्देनजर रखते हुए, Protection of Women from Domestic violence Act 2005 (Domestic Violence Act) महिलाओं की घरेलू हिंसा सुरक्षा अधिनियम २००५ (घरेलू हिंसा अधिनियम) पारित किया है। यह १७-१०-२००६ से लागू किया गया। यह अधिनियम आमूल-चूल परिवर्तन करता है। बहुत से लोग इस अधिनियम को अच्छा नहीं ठहराते है, उनका कथन है कि यह अधिनियम परिवार में और कलह पैदा करेगा। समान्यतः कानून अपने आप में खराब नहीं होता है पर खराबी, उसके पालन करने वालों के, गलत प्रयोग से होती है। यही बात इस अधिनियम के साथ भी है। यदि इसका प्रयोग ठीक प्रकार से किया जाय तो मैं नहीं समझता कि यह कोई कलह का कारण हो सकता है।

इसका सबसे पहला महत्वपूर्ण कदम यह है कि यह हर धर्म के लोगों में एक तरह से लागू होता है, यानि कि यह समान सिविल संहिता स्थापित करने में पहला बड़ा कदम है।

इस अधिनियम में घरेलू हिंसा को परिभाषित किया गया है। यह परिभाषा बहुत व्यापक है। इसमें हर तरह की हिंसा आती हैः मानसिक, या शारीरिक, या दहेज सम्बन्धित प्रताड़ना, या कामुकता सम्बन्धी आरोप। यदि कोई महिला जो कि घरेलू सम्बन्ध में किसी पुरूष के साथ रह रही हो और घरेलू हिंसा से प्रताड़ित की जा रही है तो वह इस अधिनियम के अन्दर उपचार पा सकती है पर घरेलू संबन्ध का क्या अर्थ है।

इस अधिनियम में घरेलू सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया है। इसके मुताबिक कोई महिला किसी पुरूष के साथ घरेलू सम्बन्ध में तब रह रही होती जब वे एक ही घर में साथ रह रहे हों या रह चुके हों और उनके बीच का रिश्ता:

  • खून का हो; या
  • शादी का हो; या
  • गोद लेने के कारण हो; या
  • वह पति-पत्नी की तरह हो; या
  • संयुक्त परिवार की तरह का हो।

इस अधिनियम में जिस तरह से घरेलू सम्बन्धों को परिभाषित किया गया है, उसके कारण यह उन महिलाओं को भी सुरक्षा प्रदान करता है जो,

  • किसी पुरूष के साथ बिना शादी किये पत्नी की तरह रह रही हैं अथवा थीं; या
  • ऐसे पुरुष के साथ पत्नी के तरह रह रही हैं अथवा थीं जिसके साथ उनकी शादी नहीं हो सकती है।

इस अधिनियम के अंतर्गत महिलायें, मजिस्ट्रेट के समक्ष, मकान में रहने के लिए, अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए, गुजारे के लिए आवेदन पत्र दे सकती हैं और यदि इस अधिनियम के अंतर्गत यदि किसी भी न्यायालय में कोई भी पारिवारिक विवाद चल रहा है तो वह न्यायालय भी इस बारे में आज्ञा दे सकता है।

लैंगिक न्याय और अपराध

विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में

लैंगिक न्याय से सम्बन्धित, सबसे ज्यादा विवादास्पद विषय दण्ड न्याय का है। यहां पर न केवल लैंगिक न्याय को देखना है पर उसका अभियुक्त के अधिकारों के साथ ताल- मेल भी बैठाना है। इसके पहले कि हम इस विषय पर हम नजर डालें, भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code) में वैवाहिक सम्बन्धी अपराध से संबन्धित धाराओं को देखना ठीक रहेगा जिन्हें भारत सरकार के द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग ने यह कहते हुये हटाने की मांग की गयी थी कि वे १९वीं शताब्दी की मान्यता को बनाये रखती हैं जिसमें पत्नी को पति की सम्पत्ति माना जाता था और जो पत्नियों को पति से न्याय दिलाने में मुश्किल पैदा करता है।

वैवाहिक सम्बन्धी अपराध, भारतीय दण्ड संहिता के २०वें अध्याय में हैं। इस अध्याय में छः धारायें हैं पर हम बात करेंगे धारा ४९७ (Adultery) और ४९८ (Enticing or taking away or detaining with criminal intent a married woman) की।

आचरण कानूनी तौर पर गलत हो सकता है और अपराध भी, पर इन पर इन दोनों में अंतर है। यदि कोई आचरण, कानून के विरूद्घ है तो वह कानूनी तौर पर गलत आचरण है। सारे कानूनी तौर पर गलत आचरण के लिये सजा नहीं है और जिनके लिये है वे अपराध या फिर जुर्म कहलाते हैं। अर्थात हर अपराध, कानूनी तौर पर गलत आचरण होता है पर हर गलत आचरण अपराध नहीं होता है। कानूनी तौर पर गलत आचरण के व्यावहारिक परिणाम (civil consequences) हो सकते हैं।

किसी विवाहित व्यक्ति के लिए अपने पती/पत्नी की अनुमति के बिना, किसी अन्य व्यक्ति के साथ संभोग करना कानूनी तौर पर गलत आचरण है पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा ४९७ केवल उस पुरूष को दण्डित करती है जो कि किसी विवाहित महिला के साथ उसके पति की अनुमति के बिना संभोग करता है। यहाँ यह आचरण विवाहित महिला के लिए अपराध नहीं है।

यदि कोई विवाहित पुरूष किसी अविवाहित महिला के साथ अपनी पत्नी की अनुमति के बिना संभोग करता है तो यह अपराध नहीं है हालांकि कि यह कानूनी तौर पर गलत आचरण है।

जैसा मैंने पहले बताया है कि कानूनी तौर पर गलत आचरण के व्यावहारिक परिणाम हो सकते हैं। उपर बताये गये, कानूनी तौर पर गलत आचरण (जो अपराध नहीं हैं) उन पर भी तलाक हो सकता है।

इसी तरह से भारतीय दण्ड संहिता की धारा ४९८ में, विवाहित महिला को गलत इरादे से संभोग करने के लिये भगा ले जाने को अपराध करार करती है।

दण्ड प्रक्रिया की धारा १९८ (२) के अंतर्गत, इन दोनों अपराधों की संज्ञान भी खास परिस्थिति में ही लिया जा सकता है। अथार्त सब लोग इस बारे में शिकायत नहीं कर सकते हैं।

दुनिया के बहुत सारे देशों में इस तरह के आचरण को अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा गया है पर तलाक लिया जा सकता है।

यह दोनों धाराओं में महिलाओं से पक्षपात परिलक्षित होता है। इन दोनों धाराओं की वैधता को चुनौती दी गयी थी पर उच्चतम न्यायालय ने सबसे इन दोनों धाराओं के लिए १९५९ में Alamgir Vs. State of Biihar में वैध मान लिया। उच्चतम न्यायालय ने इसके बाद के निर्णयों में यही मत बहाल रखा। न्यायालय के अनुसार,

धारा ४९८, के प्राविधान धारा ४९७ की तरह पतियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिये है न कि पत्नियों के अधिकारों के लिये।


आज के समय में धारा ४९८ की नीति, महिलाओं की सामाजिक स्थिति एवं शादी के आपसी अधिकारों व कर्तव्य से असंगत है।


यह नीति के सवाल हैं और इनका न्यायालय से कोई सम्बन्ध नहीं है।

यौन अपराध (Sexual offence)
यौन अपराध के मुकदमों में सबसे ज्यादा चर्चित मुकदमा Tuka Ram Vs. State of Maharashtra है। यह मथुरा बलात्कार केस के नाम से भी जाना जाता है। इसके अन्दर मथुरा नाम की लड़की अपने प्रेमी के साथ भाग गयी थी। उसके भाई ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी। इस पर वह पकड़ी गयी और पुलिस स्टेशन लायी गयी। वहां उसका बयान भी दर्ज किया गया। कहा जाता है कि पुलिस स्टेशन के अन्दर, उसके साथ हेड कांस्टेबिल और अन्य कांस्टेबिलों ने उसके साथ बलात्कार किया। मैं यह इसलिये कह रहा हूं क्योंकि यह आरोपी, उच्चतम न्यायालय के द्वारा वे छोड़ दिये गये हैं। इस केस की महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें इस बात से कोई इंकार नहीं था कि पुलिस स्टेशन के अन्दर हेड कांस्टेबिल और बाकी कांस्टेबिलों ने लड़की के साथ संभोग किया पर सवाल यह था कि क्या इस संभोग में लड़की की रजामंदी थी अथवा नहीं।

इस मुकदमे में परीक्षण न्यायालय ने आरोपियों को छोड़ दिया था पर बम्बई उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली थी। उच्चतम न्यायालय ने आरोपियों की अपील स्वीकार कर, उन्हें छोड़ दिया। उच्चतम न्यायालय के अनुसार,

प्रश्नगत सहमति ऎसी सहमति नहीं थी जिसे यह कहकर अस्वीकृत किया जा सके कि वह निश्चेष्ट आत्म-समर्पण है।

उच्च न्यायालय ने इस तरह का कोई भी निष्कर्ष नहीं दिया गया कि संभोग करने के लिये मृत्यु या चोट पहुंचाने की धमकी दी गयी थी।’

अधिकतर न्यायविद इस निर्णय को गलत निर्णय मानते हैं। मेरे विचार से यह उच्चतम न्यायालय के अच्छे निर्णयों में से नहीं है।

इस निर्णय के आने के पहले ही, विधि आयोग ने १९७१ में ही अपनी ४२वीं रिपोर्ट पर बलात्कार के कानून को बदलने के लिए कहा था पर सरकार ने कुछ नहीं किया था। इस निर्णय के बाद उठे तूफान पर, सरकार ने पुन: विधि आयोग से रिपोर्ट देने की प्रार्थना की।

विधि आयोग ने १९८० में अपनी ८४वीं रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट की कुछ संस्तुतियों की स्वीकृति के बाद, Criminal Law Amendment Act 1983 ( Act no. 43 of 1983) के द्वारा फौजदारी कानून में इस विषय पर आमूल-चूल परिवर्तन किया गया।

इस संशोधन अधिनियम से,

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३७५ व ३७६ के स्थान पर नई धारायें स्थापित की गयी और धारायें ३७६-क से ३७६-घ जोड़ी गयी।
  • साक्ष्य अधिनियम में भी नयी धारा 114-A जोड़ी गयी। इस संशोधन के द्वारा, कुछ परिस्थितियों में (जैसे कि मथुरा बलात्कार मुकदमे में थीं) आरोपी को सिद्घ करना है कि बलात्कार नहीं हुआ है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३२३ भी बदली गयी। अब न्यायालय बलात्कार के मुकदमे का विचारण बन्द कमरे में कर सकता है; या मीडिया में उसके प्रचार को मना कर सकता है।

बलात्कार परीक्षण: साक्ष्य, प्रक्रिया Rape Trials: Evidence, Procedure

विधि आयोग ने अपनी ८४वीं रिपोर्ट पर साक्ष्य अधिनियम को भी बदलने के लिए संस्तुति की थी। इस रिपोर्ट के द्वारा साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६ की उपधारा ४ और नयी धारा 53-A जोड़ने की बात है। लेकिन सरकार ने रिपोर्ट की इन संतुतियों को स्वीकार नहीं किया। यह संशोधन साक्ष्य अधिनियम में नहीं किया गया है। इसके बावजूद न्यायालयों ने इसके सिद्घान्त को अपने निर्णयों के द्वारा स्वीकार कर लिया है। मुख्यत:, यह कार्य उन्होंने, १९९१ और १९९६ में दो अलग-अलग निर्णयों State of Maharashtra Vs. Madhukar Narain Mardikar (मधुकर केस) और १९९६ में State of Punjab Vs. Gurmeet Singh (गुरमीत केस), में किया है।

मधुकर केस, सेवा से सम्बन्धित केस था। एक पुलिस इंस्पेक्टर पर, बलात्कार करने में और उसके सम्बन्ध में गलत कागजात तैयार करने का आरोप था। विभागीय कार्यवाही में, यह आरोप सिद्घ हो जाने के बाद, पुलिस इन्स्पेक्टर को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। पुलिस इन्स्पेक्टर ने, बम्बई उच्च न्यायालय में गुहार लायी। उसकी याचिका स्वीकार कर ली गयी और उसे नौकरी पर वापस कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय इस फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया,

उच्च न्यायालय ने कहा कि, बनुबी गिरे चरित्र की महिला थी और किसी भी सरकारी अफसर का भविष्य ऎसी महिला के असमर्थित बयान पर तय करना ठीक नहीं होगा जो कि अपने और दूसरे व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धों को स्वीकार करती है। इस महिला ने अपने जीवन के गिरे हिस्से को स्वीकार कर सच्चाई बरती है। आसान सतीत्व चरित्र की महिलाओं को भी एकान्तता का अधिकार है। उनकी एकान्तता के साथ कोई व्यक्ति मनमानी नहीं कर सकता है। किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है।

गुरमीत सिंह का केस बलात्कार से सम्बन्धित दाण्डिक केस था। विचारण न्यायालय ने गुरमीत सिंह को छोड़ दिया था लेकिन पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर गुरमीत सिंह को सजा दे दी थी। उच्चतम न्यायालय ने गुरमीत सिंह की सजा बहाल करते हुये कहा,

बलात्कार के मामलों पर संवेदनशीलता से विचार करना चाहिए। न्यायालयों को मुकदमें की व्यापक संभावनाओं को देखना चाहिए और अभियोक्त्री के कथन में मामूली विसंगतियों या अमहत्वपूर्ण अंतर के कारण डांवाडोल नहीं होना चाहिए। यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए।

कई अधिवक्ता, अभियोक्त्री से बलात्कार के संबंध में निरंतर प्रश्न करते रहने की नीति अपनाते हैं। उससे बलात्कार संबंधित घटना के ब्यौरे को बार-बार दोहराने की अपेक्षा इसलिये नहीं की जाती है, ताकि अभिलेख पर तथ्यों को लाया जा सके अथवा उसकी विश्वसनीयता का परीक्षण किया जा सके बल्कि इसलिये कि घटनाक्रम के निर्वचन को मोड़कर उसमें विसंगति लायी जा सके। न्यायालय को यह देखना चाहिए कि प्रतिपरीक्षा, आहत व्यक्ति को परेशान करने या जलील करने का तरीका तो नहीं है। प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये।
यह भी विचारणीय है कि क्या यह अधिक वांछनीय नहीं कि, जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए। इस तरह आहत महिला आसानी से अपना बयान दे सकती है।
जहां तक संभव हो, न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें जिससे उसे आगे जलील न होना पड़े।
हम यह आशा करते हैं कि विचारण न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३२७ (२) और (३) के अन्दर निहित अधिकारों का उपयोग उदारतापूर्वक करेंगे। सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।

इन दो निर्णयों के द्वारा न्यायालयों ने इन छः सिद्धानतों को प्रतिपादित किया हैः

  1. किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है;
  2. यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए;
  3. प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये;
  4. जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए;
  5. न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें;
  6. सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।

दहेज (Dowry) संबन्धित कानून

दहेज बुरी प्रथा है। इसको रोकने के लिये दहेज प्रतिषेध अधिनियम १९६१ बनाया गया है पर यह कारगर सिद्घ नहीं हुआ है। इसकी कमियों को दूर करने के लिये फौजदारी (दूसरा संशोधन) अधिनियम १९८६ के द्वारा, मुख्य तौर से निम्नलिखित संशोधन किये गये हैं:

  • भारतीय दण्ड संहिता में धारा ४९८-क,
  • साक्ष्य अधिनियम में धारा ११३-क, यह धारा कुछ परिस्थितियां दहेज मृत्यु के बारे में संभावनायें पैदा करती हैं;
  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम को भी संशोधित कर मजबूत किया गया है।

पर क्या केवल कानून बदलने से दहेज की बुराई समाप्त हो सकती है। – शायद नहीं। यह तो तभी समाप्त होगी जब हम दहेज मांगने, या देने या लेने से मना करें। उच्चतम न्यायालय ने भी १९९३ में, कुण्डला बाला सुब्रमण्यम प्रति आंध्र प्रदेश राज्य में कुछ सुझाव दिये हैं। न्यायालय ने कहा,

बुराई केवल कानून से दूर नहीं की जा सकती है। इस बुराई पर जीत पाने के लिये सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में, जहां महिलायें अनपढ़ हैं और अपने अधिकारों को नहीं जानती हैं। वे आसानी से इसके शोषण की शिकार बन जाती हैं।. . . .

न्यायालयों को इस तरह के मुकदमे तय करते समय व्यावहारिक तरीका अपनाना चाहिये ताकि अपराधी, प्रक्रिया संबन्धी कानूनी बारीकियों के कारण या फिर गवाही में छोटी -मोटी, कमी के कारण न छूट पाये। जब अपराधी छूट जाते हैं तो वे प्रोत्साहित होते हैं और आहत महिलायें हतोत्साहित। महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमे तय करते समय न्यायालयों को संवेदनशील होना चाहिये।

इस मुकदमे में परीक्षण न्यायालय ने दोषी को छोड़ दिया था। यह दर्शाता है कि न्यायालय संवेदनशील नहीं हैं।

उच्चतम न्यायालय का कथन अपनी जगह सही है पर मेरे विचार से दहेज की बुराई तभी दूर हो सकती है जब,

  • महिलायें शिक्षित हों;
  • और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों।

इसके लिये, समाज में एक मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है जिसमें महिलाओं को केवल यौन या मनोरंजन की वस्तु न समझा जाय- न ही बच्चा पैदा करने की वस्तु।

काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़: Sexual harassment at working place

काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ उससे कहीं अधिक है जितना कि हम और आप समझते हैं। यह बात, शायद काम करने वाली महिलाये या वे परिवार जहां कि महिलायें घर के बाहर काम करती हैं ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इस बारे में संसद के द्वारा बनाया गया कोई कानून नहीं है पर १९९७ में Vishakha Vs. State of Rajasthan (विशाखा केस) में प्रतिपादित या फिर कहें कि बनाया गया है।

यह निर्णय, न केवल महत्वपूर्ण है, पर अनूठा भी है।

संसद का काम कानून बनाना है, कार्यपालिका का काम उस पर अमल करना है; और न्यायालय का काम कानून की व्याख्या करना है। प्रसिद्घ न्यायविद फ्रांसिस बेकन ने कहा कि, न्यायाधीश का काम,

‘To interpret law and not to make law’ न्याय की व्याख्या करना है न कि कानून बनाना।

न्यायविद हमेशा से इसी पर जोर देते चले आ रहे हैं। हालांकि २०वीं शताब्दी में ब्रिटेन के न्यायाधीश जॉन रीड ने कहा,

‘’ हम अब इस तरह की परी कथाओं में विश्वास नहीं करते हैं।

विशाखा केस में न्यायायलय ने यौन उत्पीड़न (Sexual harassment) को परिभाषित किया और वे सिद्घान्त बनाये जो काम किये जाने की जगह पर अपनाये जाने चाहिये। यह काम संसद का है न कि न्यायपालिका का नहीं फिर भी न्यायालय ने ऐसा किया। यह अपने देश का पहला केस है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कानून बनाया। न्यायालय के शब्दों में,

‘The guidelines and norms [ regarding sexual harassment at working place] would be strictly observed in all workplaces for the preservation and enforcement of the right to gender equality of the working women. These directions would be binding and enforceable in law until suitable legislation is enacted to occupy the field.’ यह सिद्घान्त तब तक लागू रहेंगे जब तक न्यायालय इस बारे में कोई कानून न बनाये।

विशाखा केस के सिद्घान्तों को १९९९ में Apparel Export promotion Council Vs. A.K.Chopra (चोपड़ा केस) में लागू किया गया। इस केस में चोपड़ा की सेवायें, विभागीय कार्यवाही में, इसलिये समाप्त कर दी गयी क्योंकि उसने काम की जगह पर, एक कनिष्क महिला कर्मचारी के साथ छेड़छाड़ की थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने चोपड़ा की याचिका स्वीकार करते हुये उसे वापस सेवा में ले लिया परन्तु जितने समय तक उसने काम नहीं किया था, उसका वेतन नहीं दिलवाया।

उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय के विरूद्घ अपील को स्वीकार कर, चोपड़ा की सेवायें समाप्त करने के विभागीय आदेश को बहाल कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि,


काम करने की जगह, यौन उत्पीड़न का होना लैंगिक समानता, स्वतंत्रता एवं जीने के मौलिक अधिकारों का हनन है। यह अधिकार, हमारे संविधान के दो बहुमूल्य अधिकार हैं।

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय को फटकार लगाते हुये कहा,


उच्च न्यायालय ने कहा है कि विपक्ष पक्ष [चोपड़ा] ने सुश्री ‘क’ के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी पर केवल इसका प्रयत्न किया था इसलिये उसे सेवा से हटाया जाना ठीक नहीं था। उनकी यह टिप्पणी वास्तविकता के खिलाफ है। विपक्ष पक्ष का अपनी कनिष्ठ महिला कर्मचारी के साथ का बर्ताव किसी तरह से क्षम्य नहीं था इस तरह के मामले में सजा कम करना पीछे जाने का कदम है। उच्च न्यायालय ने मामले को गलत तरीके से देखा है।

समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता (privacy)

किसी भी सफल न्याय प्रणाली के लिये समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता, (privacy) का अधिकार महत्वपूर्ण है। यह लैंगिक न्याय के परिपेक्ष में भी सच है। यह बात न्यायालयों ने कई निर्णयों में कहा है। आइये इसमें से कुछ को देखें।

समान काम, समान वेतन Equal pay for equal work

समानता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद १४ से १८ में है पर यह लैंगिक न्याय के दायरे में ‘समान काम, समान वेतन’ के दायरे में महत्वपूर्ण है। ‘समान काम, समान वेतन’ की बात संविधान के अनुच्छेद ३९ (घ) में कही गयी है पर यह हमारे संविधान के भाग चार ‘राज्य की नीति के निदेशक तत्व’ (Directive Principles of the State policy) के अन्दर है। यह न्यायालय द्वारा क्रियान्वित (Enforce) नहीं किया जा सकते है पर देश को चलाने में इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

महिलायें किसी भी तरह से पुरूषों से कम नहीं है। यदि वे वही काम करती है जो कि पुरूष करते हैं तो उन्हें पुरूषों के समान वेतन मिलना चाहिये। यह बात समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act) में भी कही गयी है और इसे (M/s Mackinnon Mackenzie and Co. Ltd. Vs. Audrey D’costa and other) (मैकेन्निन केस) में लागू किया।

इसमें महिला आशुलिपिक को पुरूषों से कम वेतन मिलता था। कम्पनी के अनुसार केवल महिलायें ही व्यक्तिगत आशुलिपिक (Confidential Stenographer) नियुक्त की जा सकती है और उनका वर्ग पुरूष आशुलिपिक से अलग है। इसलिये उन्हें कम वेतन दिया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने इसे नहीं माना। न्यायालय का कहना था कि,


महिलायें व्यक्तिगत आशुलिपिक बनने के लिये न तो खास तौर से शिक्षित है न ही वे लिंग के कारणों से किसी अन्य कार्य करने के लिये अक्षम हैं। यह प्रबंधतंत्र की नीति है कि वे महिलाओं को व्यक्तिगत आशुलिपिक बनाते हैं। यदि वे इस तरह की नीति अपनाते हैं तो इस कारण वे महिलाओं को पुरूषों के बराबर वेतन देने को मना नहीं कर सकते हैं।

स्वतंत्रता (liberty)
मौलिक अधिकार, संविधान के भाग तीन में हैं। यह सारे, कुछ न कुछ, स्वतंत्रता के अलग अलग पहलूवों से संबन्ध रखते हैं पर इस बारे में संविधान के अनुच्छेद १९ तथा २१ महत्वपूर्ण हैं। अनुच्छेद १९ के द्वारा कुछ स्पष्ट अधिकार दिये गये हैं और जो अनुच्छेद १९ या किसी और मौलिक अधिकार में नहीं हैं वे सब अनुच्छेद २१ में समाहित हैं। आइये इस सम्बन्ध में C.B.Muthamma IFS Vs. Union of India (मुथन्ना केस) को समझें।

विदेश सेवा के नियमों के अन्दर ,

  • विवाहित महिलाओं का विदेश सेवा में चयन नहीं किया जा सकता था;
  • विदेश सेवा में काम करने वाली अविवाहित महिला को, शादी करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी; और
  • यदि सरकार इस बारे में संतुष्ट है कि उसका परिवार उसके रास्ते में आयेगा तो वह उसकी सेवायें समाप्त कर सकती थी।

यह नियम केवल महिलाओं के लिए था पुरूषों के लिए नहीं। यह नियम, १९७९ में, मुथन्ना केस में अवैध घोषित कर दिया गया। न्यायालय ने कहा कि,


इन नियमों में महिलाओं के खिलाफ भेद-भाव स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है। यदि पारिवारिक एवं घरेलू जिम्मेदारियां महिला कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं तो यह बात पुरूषों पर भी लागू होती है। महिलाओं के प्रति इस समय भी इस तरह का पूर्वाग्रह हमारी समझ के बाहर है।

यदि कार्यपालिका इस तरह के नियम बनाती है उससे महिलाओं के प्रति भेदभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।

एकान्तता (privacy)

हमारे संविधान का कोई भी अनुच्छेद, स्पष्ट रूप से एकान्तता की बात नहीं करता है। अनुच्छेद २१ स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार की बात करता है पर एकान्तता की नहीं। १९९२ में मुकदमे Neera Mathur Vs. Life Insurance Corporation में उच्चत्तम न्यायालय ने एकान्तता के अधिकार को, अनुच्छेद २१ के अन्दर, स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार का हिस्सा माना।

नीरा माथुर, जीवन बीमा निगम में प्रशिक्षु थीं। अपने प्रशिक्षण के दौरान उसने अवकाश लिया पर जब वह वापस आयीं तो उनकी सेवायें समाप्त कर दी गयी। उन्होने दिल्ली उच्च न्यायालय में गुहार लगायी। निगम ने न्यायालय को बताया कि, उसे नौकरी से इसलिये हटा दिया गया क्योंकि उसने नौकरी पाने के समय झूठा घोषणा पत्र दिया था।

निगम में सेवा प्राप्त करने से पहले एक घोषणा पत्र देना होता है। महिलाओं को इसमें कुछ खास सूचनायें बतानी पड़ती थीं, जैसे कि,

  • रजोधर्म की आखिरी तिथि क्या है?
  • क्या वे गर्भवती हैं?
  • उनका कभी गर्भपात हुआ है कि नहीं, इत्यादि।

अवकाश के दौरान नीरा को बिटिया हुयी थी और जीवन बीमा निगम के अनुसार उसने घोषणा पत्र में जो रजोधर्म की आखिरी तारीख लिखी थी यदि वह सही है तो उसे यह बिटिया नहीं पैदा हो सकती थी। इसलिये वे इस घोषणा पत्र को झूठा बता रहे थे।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने नीरा माथुर की याचिका खारिज कर दी पर उच्चतम न्यायालय ने उसकी अपील स्वीकार कर, उसे सेवा में वापस कर दिया। उनके मुताबिक यह सूचना किसी महिला की एकान्तता से सम्बन्धित है। न्यायालय ने कहा कि,


इस तरह की सूचना मांगना यदि अपमानजनक नहीं है तो कम से कम शर्मिन्दा करने वाली है।

निष्कर्ष (Conclusion)

हम लोग इस समय २१वीं सदी में पहुंच रहे हैं। लैंगिक न्याय की दिशा में बहुत कुछ किया जा चुका है पर बहुत कुछ करना बाकी भी है। क्या भविष्य में महिलाओ को लैंगिक न्याय मिल सकेगा। इसका जवाब तो भविष्य ही दे सकेगा पर लगभग ३० साल पहले रॉबर्ट केनेडी ने कहा था,

केवल कानून के बारे में बात कर लेने से महिला सशक्तिकरण नहीं हो सकता है। इसके लिये समाजिक सोच में परिवर्तन होना पड़ेगा। फिर भी, यदि हम लैंगिक न्याय के बारे में सोचते हैं, इसके बारे में सपने देखते हैं – तब,...................................

Monday, April 19, 2010

खुदा से क्या मांगू तेरे वास्ते
सदा खुशियों से भरे हों तेरे रास्ते
हंसी तेरे चेहरे पे रहे इस तरह
खुशबू फूल का साथ निभाती है जिस तरह
सुख इतना मिले की तू दुःख को तरसे
पैसा शोहरत इज्ज़त रात दिन बरसे
आसमा हों या ज़मीन हर तरफ तेरा नाम हों
महकती हुई सुबह और लहलहाती शाम हो
तेरी कोशिश को कामयाबी की आदत हो जाये
सारा जग थम जाये तू जब भी गए
कभी कोई परेशानी तुझे न सताए
रात के अँधेरे में भी तू सदा चमचमाए
दुआ ये मेरी कुबूल हो जाये
खुशियाँ तेरे दर से न जाये
इक छोटी सी अर्जी है मान लेना
हम भी तेरे दोस्त हैं ये जान लेना
खुशियों में चाहे हम याद आए न आए
पर जब भी ज़रूरत पड़े हमारा नाम लेना
इस जहाँ में होंगे तो ज़रूर आएंगे
दोस्ती मरते दम तक निभाएंगे