Wednesday, June 23, 2010

my past

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो ♥
ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा
मगर मुझको लौटा दो वो क्वालेज का कन्टीन,
वो चाय का पानी, वो तीखा समोसा..........

कडी धूप मे अपने घर से निकलना,
वो प्रोजेक्ट की खातीर शहर भर भटकना,
वो लेक्चर मे दोस्तों की प्रोक्झी लगाना,
वो सर को चीढाना ,वो एरोप्लेन उडाना,
वो सबमीशन की रातों को जागना जगाना,
वो ओरल्स की कहानी, वो प्रक्टीकल का किस्सा.....
बीमारी का कारण दे के टाईम बढाना,

वो दुसरों के Assignments को अपना बनाना,
वो सेमीनार के दिन पैरो का छटपटाना,
वो WorkShop मे दिन रात पसीना बहाना,

वो Exam के दिन का बेचैन माहौल,
पर वो मा का विश्वास - टीचर का भरोसा.....
वो पेडो के नीचे गप्पे लडाना,
वो रातों मे Assignments Sheets बनाना,

वो Exams के आखरी दिन Theater मे जाना,
वो भोले से फ़्रेशर्स को हमेशा सताना,
Without any reason, Common Off पे जाना,
टेस्ट के वक्त Table me मे किताबों को रखना,

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा

Monday, June 14, 2010

sakahaar

गर्व था भारत-भूमि को के दयावान की माता हूँ।
राम-कृष्ण और नानक जैसे वीरो की यशगाथा हूँ॥
कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे।
'पोरस' जैसे शूर-वीर को नमन 'सिकंदर' करते थे॥

चौदह वर्षों तक खूखारी वन में जिसका धाम था।
मन-मन्दिर में बसने वाला शाकाहारी राम था॥
चाहते तो खा सकते थे वो मांस पशु के ढेरो में।
लेकिन उनको प्यार मिला 'शबरी' के झूठे बेरो में॥

माखन चोर मुरारी थे।
शत्रु को चिंगारी थे॥
चक्र सुदर्शन धारी थे।
गोवर्धन पर भरी थे॥

मुरली से वश करने वाले 'गिरधर' शाकाहारी थे॥
करते हो तुम बातें कैसे 'मस्जिद-मन्दिर-राम' की?
खुनी बनकर लाज लूटली 'पैगम्बर' पैगाम की॥

पर-सेवा पर-प्रेम का परचम चोटी पर फहराया था।
निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥
सपने जिसने देखे थे मानवता के विस्तार के।
नानक जैसे महा-संत थे वाचक शाकाहार के॥

उठो जरा तुम पढ़ कर देखो गौरव-मयी इतिहास को।
आदम से गाँधी तक फैले इस नीले आकाश को॥
प्रेम-त्याग और दया-भाव की फसल जहाँ पर उगती है।
सोने की चिडिया न लहू में सना बाजरा चुगती है॥

दया की आँखे खोल देख लो पशु के करुण क्रंदन को।
इंसानों का जिस्म बना है शाकाहारी भोजन को॥
अंग लाश के खा जाए क्या फ़िर भी वो इंसान है?
पेट तुम्हारा मुर्दाघर है या कोई कब्रिस्तान है?

आँखे कितना रोती हैं जब उंगली अपनी जलती है।
सोचो उस तड़पन की हद जब जिस्म पे आरी चलती है॥
बेबसता तुम पशु की देखो बचने के आसार नही।
जीते जी तन कटा जाए, उस पीडा का पार नही॥
खाने से पहले बिरयानी चीख जीव की सुन लेते ।
करुणा के वश होकर तुम भी गिरि-गिरनार को चुन लेते॥

Sunday, June 13, 2010

मजहबी कागजो पे नया शोध देखिये।

वन्दे मातरम का होता विरोध देखिये।

देखिये जरा ये नई भाषाओ का व्याकरण।

भारती के अपने ही बेटो का ये आचरण।

वन्दे-मातरम नही विषय है विवाद का।

मजहबी द्वेष का न ओछे उन्माद का।

वन्दे-मातरम पे ये कैसा प्रश्न-चिन्ह है।

माँ को मान देने मे औलाद कैसे खिन्न है।
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मात भारती की वंदना है वन्दे-मातरम।

बंकिम का स्वप्न कल्पना है वन्दे-मातरम।

वन्दे-मातरम एक जलती मशाल है।

सारे देश के ही स्वभीमान का सवाल है।

आह्वान मंत्र है ये काल के कराल का।

आइना है क्रांतिकारी लहरों के उछाल का।


वन्दे-मातरम उठा आजादी के साज से।

इसीलिए बडा है ये पूजा से नमाज से।
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भारत की आन-बान-शान वन्दे-मातरम।

शहीदों के रक्त की जुबान वन्दे-मातरम।

वन्दे-मातरम शोर्य गाथा है भगत की।

मात भारती पे मिटने वाली शपथ की।

अल्फ्रेड बाग़ की वो खूनी होली देखिये।

शेखर के तन पे चली जो गोली देखिये।

चीख-चीख रक्त की वो बूंदे हैं पुकारती।

वन्दे-मातरम है मा भारती की आरती।

(विरोध करने वालो ने कहा की मुसलमान वंदे-मातरम इसलिए नही गायेंगे क्योंकि उनका मजहब इसके पक्ष में नही है....तब एक प्रश्न जन्म लेता है...की क्या जिन मुसलमानों ने वंदे मातरम गाते गाते अपने प्राण माँ भरती के चरणों में समर्पित कर दिए वो सच्चे मुसलमान नही थे....या जो विरोध कर रहे हैं वो सच्चे मुसलमान नही हैं॥?

वन्दे-मातरम के जो गाने के विरुद्ध हैं।

पैदा होने वाली ऐसी नसले अशुद्ध हैं।

आबरू वतन की जो आंकते हैं ख़ाक की।

कैसे मान लें के वो हैं पीढ़ी अशफाक की।

गीता ओ कुरान से न उनको है वास्ता।

सत्ता के शिखर का वो गढ़ते हैं रास्ता।

हिन्दू धर्म के ना अनुयायी इस्लाम के।

बन सके हितैषी वो रहीम के ना राम के।
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गैरत हुज़ूर कही जाके सो गई है क्या।

सत्ता माँ की वंदना से बड़ी हो गई है क्या।

देश तज मजहबो के जो वशीभूत हैं।

अपराधी हैं वो लोग ओछे हैं कपूत हैं।

माथे पे लगा के माँ के चरणों की ख़ाक जी।

चढ़ गए हैं फांसियों पे लाखो अशफाक जी।

वन्दे-मातरम कुर्बानियो का ज्वार है।

वन्दे-मातरम जो ना गए वो गद्दार है।
काजू भुनी प्लेट मेँ व्हिस्की गिलास मेँ ।
उतरा है राम राज्य विधायक निवास मेँ ।।
पक्के समाजवादी हैँ तस्कर होँ या डकैत ।
इतना असर है खादी के उजले लिबास मेँ ।।
पैसे से आप चाहेँ तो सरकार गिरा देँ ।
संसद बदल गयी है यहाँ की नक्खास मेँ ।।
आजादी का वो जश्न मनाएँ तो किस तरह ।
जो आ गये फुटपाथ पर घर की तलाश मेँ ।।
जनता के पास एक ही चारा है बगावत ।
ये बात कह रहा हूँ मैँ होशो हवास मेँ ।



Thursday, June 10, 2010

आइना हूँ मैं जरा मेरे सामने आकर देखो,

खुद नज़र आओगे जरा आँख मिला कर देखो,

मेरे गम में मेरी तकदीर नज़र आती है,

डगमगा जाओगे मेरे दर्द उठा कर देखो,

यूँ तो आसान नज़र आता है मंजिल का सफ़र,

कितना मुश्किल है मेरी राह से जाकर देखो ,

दिल तुम्हारा है मैं ये जान भी दे दूँ तुम्हे पर,

बस मेरा साथ ज़रा दिल से निभा कर देखो