इतिहासकारों एंव अन्वेषण कर्ताओ का एक बड़ा वर्ग इस विचार से सहमत है कि हिन्दू शब्द का प्रेरक सिन्धु नदी है। डा० वी डी सावरकर की पुस्तक 'स्लेक्ट इन्सक्रिप्सन' में कहा गया है, सिन्धु नदी के पूर्वी एवं पश्चिमी दिशाओ के बीच के क्षेत्र एंव पश्चिमी दिशाओं के बीच के क्षेत्र के निवासियों को फारस अर्थात वर्तमान ईरान के शासक जिरक एंव दारा हिन्दू नाम से पुकारते थे। आचार्य पाणिनी ने अष्टाध्यायी में सिन्धु का अर्थ व्यक्तियों की वह जाती बतायी है, जो सिन्धु देश में रहते हैं। पण्डित जवाहर लाल नेहरु के अनुसार हिन्दू शब्द प्रत्यक्षतः सिन्धु से निकलता है, जो इसका पुराना और नया नाम है। इसी सिन्धु शब्द से हिन्दू, हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान बने है और इण्डस इण्डिया भी। समकालीन इतिहासकार हिन्दू को फारसी भाषा का शब्द मानते है। फारसी भाषा में हिन्दू एंव हिन्दू से बने अनेक शब्द मिलते है। हिन्दुवी, हिन्दनिया, हिन्दुआना, हिन्दुकुश, हिन्द आदि फारसी शब्दो में यह झलक देखी जा सकती है। फारस की पुरब दिशा का देश भारत ही वास्तव मे हिन्द था।
वर्तमान भारत, पाकिस्तान बंग्लादेश एवं अफगानिस्तान इसी क्षेत्र का भाग है। फारसी शब्दावली के नियमानुसार संस्कृत का अक्षर 'स' फारसी भाषा के अक्षर 'ह' में परिवर्तित हो जाता है। इसी कारण सिन्धु शब्द परिवर्तित होकर हिन्दू हो गया। हिन्दू शब्द जेन्दावेस्ता या धनदावेस्ता जैसी फारसी की प्राचीन धार्मिक पुस्तक में सर्वप्रथम मिलता है। संस्कृत एवं फारसी भाषा के अतिरिक्त भी अनेकों ग्रंन्थो में हिन्द या हिन्दू शब्द का प्रयोग किया गया है।
श्री वासुदेव विष्णुदेवदयाल ने अपनी पुस्तक 'द एसेन्स आफ द वेदाज एण्ड एलाइड स्क्रिपचर्स' में पृष्ठ ३-४ पर आचार्य सत्यदेव वर्मा ने 'इस्लामिक धर्म ग्रंन्थ पवित्र कुरान के संस्कृत अनुवाद की भूमिका में श्रीतनसुख राम ने अपनी पुस्तक 'हिन्दू परिचय' के पृष्ठ ३१ पर लिखा है कि अरबी भाषा के एक अँग्रेज कवि लबी बिन अखतब बिन तुरफा ने अपने काव्य संग्रह में हिन्द एंव वेद शब्द का प्रयोग किया है। ये महान कवि इस्लाम से २३०० वर्ष पूर्व हुए है। अरबी 'सीरतुलकुल' में हिन्दू शब्द का मिलना यह अवश्य सुनिश्चित करता है कि यह शब्द यूनान, फारस एंव अरब देशों में प्रचलित था और यह भी कि विश्व की परीक्रमा में विभाजित अधिकतर समकालीन राष्ट्र इस शब्द को धर्म विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष के अर्थ में नहीं बल्कि सद् गुण सम्पन्न मानव जाति या क्षेत्र विशेष के अर्थ में प्रयोग करते थे।
हिन्दू शब्द से मानवीय आदर्शो का परिचय मिलता है। साथ ही सिन्धु क्षेत्र सम्बन्धित होने के कारण इससे हम अपना राष्ट्रीय परिचय भी पाते है। हिन्दू शब्द को जब हम साम्प्रदायिकता संकीर्णताओं से जोड़ते है तो हम अपनी महानता, विशालता एवं गर्व को संकुचित मानसिकता मे बन्दी बना देना चाहते है। भारत में अपना अस्तित्व रखने वाले सभी धर्मों, सम्प्रदायों की मान्यताएँ एंव उपासना विधि भाषा, वेशभुषा, रीतिरिवाज, धार्मिक विश्वास भले ही आपस मे न मिलते हो, परन्तु सभी अपना सम्मिलित परिचय एक स्वर में गाते हुए यही देते है, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा । हो भी क्यों न, हिन्दू और हिन्दुस्तान इन सभी जातियों प्रजातियों एवं उपजातियों की मातृभूमी है। जहाँ सभी को रहने का समान अधिकार है।
मानवीय गौरव के प्रतीक इस शब्द से अपना नाता जोड़ने में महाराणा प्रताप एवं शिवाजी सरीखे देशप्रेमियों ने गर्व का अनुभव किया। गुरु गोविन्दसिंह ने भी इस शब्द के निहितार्थ का भावबिभोर होकर गान किया है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार हीन दुष्याति इति हिन्दू अर्थात जो अपनी हीनता एवं बुराई को स्वीकार कर उसे छोड़ने के लिए तैयार होता है वह हिन्दू है। 'द धर्मस्मृति' के अनुसार हिंसा से बचने वाला , सदाचारी ईश्वर की राह पर चलने वाला हिन्दू है। आचार्य माधव के अनुसार ओंकार मूलमन्त्र मे आस्था रखने वाले हिन्दू होते है। आचार्य बिनोबा भावे का कहना था, वर्णाश्रम को मानने वाला, गो सेवक, वेदज्ञान का पुजारी , समस्त धर्मो को सम्मान देने वाला , दैवी शक्तियों का उपासक , मोक्ष प्राप्ति की जिज्ञासा रखने वाला जीवन में आत्मसात करने वाला ही हिन्दू है। आज बदले हुए परिवेश में मान्यताएँ बदली हुई हैं। कतिपय चतुर लोग बड़ी चतुराई से अपने स्वार्थ के लिए, अहं की प्रतिष्ठा के लिए शब्दों का मोहक जाल बिछाते रहते है। बहेलिए की फाँसने वाली वृत्ति, लोमड़ी की चाल की अथवा फिर भेड़ियों की धूर्तता कभी उन आदर्शो को स्थापित नहीं कर सकती जिनकी स्थापना के लिए इस देश के सन्तो, ऋषियों, बलिदानियों ने अपने सर्वस्व की आहुति दे दी।
हिन्दुत्व की खोज आज हमें आदर्शवादी मान्यताओं में करनी होगी। इसमें निहित सत्य को मानवीय जीवन की श्रेष्ठता मे, सद् गुण-सम्वर्धन में खोजना होगा। धार्मिक कट्टरता एंव साम्प्रसायिक द्वेश नहीं 'वसुधैव कुटुम्ब कम्' का मूलमंत्र है। यह विवाद नहीं विचार का विषय है। स्वार्थपरता एंव सहिष्णुता अपनाकर ही हम सच्चे और अच्छे इन्सान बन सकते है। मानवीय श्रेष्ठता का चरम बिन्दु ही हमारे आर्यत्व एवं हिन्दुत्व की पहचान बनेगा,।
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