विडम्बना भारत की है, अथवा केवल भारतियों की
जो भारत को भारत कहते, और स्वयं को भारतीय
बाकी सब के लिए नहीं है, यहां विडम्बना कोई
सब कुछ जायज इस देश में, बस हिन्दु न बोलें
सारे खोलें मुँह अपना, पर हिन्दु मुँह न खोलें
क्यों ऐसा विचार उपजा है, अपने इस भारत में
कौन है दोषी इन वृतियों का, कौन जो इनको पाले
अभी समय यह नहीं, कि इन प्रश्नों को हम उछालें
पर कब तक हिन्दु, अपने मुँह पर डालेंगे ताले
जो हिन्दु की बात है करता, वह सामप्रदायिक कहलाता
पर जो मुसलिम क्रिष्चियन की करता, असामप्रदायिक कहलाता
किस डिक्शनरी में दुनिया की, ऐसा लिखा हुआ है
आओ समझें ऐसे ऐसे, ढोंग चलाने वालों को
आओ समझें ऐसे ,मुँह में राम, बगल में छुरी चलाने वालों को
क्या राम का नाम भी लेना, यहाँ हुआ है मुश्किल
बात राम के मंदिर की करना, फिर कैसे हो संभव
कैसे काले अंग्रेजों ने, भारत को ठगा हुआ है
बहुत हुआ अत्याचार यहाँ पर, अब इसकी न और जगह है
खोलो आँखें, खोलो बुद्धि के पट अपने
अपने अधिकारों को समझो, स्वाभिमान को समझो
सम-दृष्टि यह नहीं, कि हिन्दु अपनी आँखें फोड़ें
दुनिया भर की जय करें, पर अपनी जय न बोलें
तो फिर वोट उसी को देना, जो अब अपनी जय भी बोलें
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