माँ से-
माँ तुम्हारा लाड़ला रण में अभी घायल हुआ है।
देख उसकी शूरता खुद शत्रु भी कायल हुआ है॥
रक्त की होली रचाकर मैं प्रलयकर दिख रहा हूँ।
माँ उसी शोणित से तुमको पत्र अन्तिम लिख रहा हूँ॥
युद्ध भीषण था मगर ना इंच भी पीछे हटा हूँ।
माँ तुम्हारी थी शपथ मैं आज इंचों में कटा हूँ॥
एक गोली वक्ष पर कुछ देर पहले ही लगी है।
माँ कसम दी थी जो तुमने आज मैंने पूर्ण की है॥
छा रहा है सामने लो आँख के आगे अँधेरा।
पर उसी में दिख रहा है मुझे इक नूतन सवेरा॥
कह रहे हैं शत्रु भी मैं इस तरह शैदा हुआ हूँ।
लग रहा है सिंहनी की कोख से पैदा हुआ हूँ॥
जिनके शोणित के झरनों से आजादी की फसल पली।
जिनके लोहू के सिंचन से हर गुलाब की कली खिली॥
जिनके वज्र इरादों ने हिमगिरि लाशों से पाट दिया।
जिनकी शमशीरों ने बढ़कर दुश्मन का सर काट लिया॥
मेरी पीढी आज ऋणी है उन भीषण तूफानों की।
मेरी कलम कथा कहती है उनके ही बलिदानों की॥
दिल्ली का गढ बातें करता अब तक भी चौहानों की।
कल इतिहास गवाही देगा बैरागी के बाणों की॥
जिनके गर्म लहू से रंजित झेलम का ठण्डा पानी।
जिन्दा टैंक दफन कर डाले पानी था राजस्थानी॥
जैसलमेर कथा कहता है ऐसे कब्रिस्तानों की।
मेरी कलम कथा कहती है उनके ही बलिदानों की॥
माना कि उजाला हार गया इस बार कुटिल अँधियारों से।
सचमुच ही किरणें घायल हैं सूरज के पहरेदारों से॥
देखो वह शबनम रोती है दिन-रात यहाँ मयखानों में।
माना कि बहारें कैद पड़ी पतझर के बन्दीखानों में॥
लेकिन हम भी शंकर बनकर यह सारा जहर निगल लेंगे।
इस आग उगलते मौसम का माहौल बदलकर रख देंगे॥
गंगा की लहरें घायल हैं बस अपने ही रखवालों से।
सरयू का पानी रक्तिम है खुद अपने ही तटवालों से॥
अब शबरी मीठे बेर काटती विष डूबी तलवारों से।
अब रघुवर को घायल करता केवट देखो पतवारों से॥
हम ऐसे घातक केवट की पतवार काटकर रख देंगे।
इस आग उगलते मौसम का माहौल बदलकर रख देंगे॥
जहाँ शीश ले निज करतल पर युद्ध किया करते हैं
और मान के धनी प्राणधन वार दिया करते हैं
जहाँ फूल-सी कोमल नारी शोलों पर चलती है
और वंश की बेल नुकीले भालों पर पलती है
राजस्थान उन्हीं वीरों की रखता अमिट निशानी
पन्ना हाड़ा, चूडावत ने लिक्खी अमर कहानी
मेवाडी यह धरा, शौर्य की कथा कहा करती है
पानी कम है मगर रक्त की नदी बहा करती है
राणा पुत्र अमरसिंह भी मेवाड वंश गौरव थे
चूडावत शक्तावत मानो दुश्मन को रौरव थे
चूडावत शक्तावल रण के बहुत बडे मानी थे
बडे-बडे योद्धा भी उनके कहीं नहीं सानी थे
किन्तु हरावल दस्ते में बस चूडावत लड ते थे-
शक्तावत यह देख-देखकर मन ही मन कुढ ते थे
जैसे कोई शेर पींजरे में क्रोधित आकुल हो
बरसों से कोई शिकार, करने को ज्यों व्याकुल हो
यह विचार उन सबको ही बालूसिंह तक ले आया
पहले तो वह इधर-उधर बन्दर घुड़की दिखलाता था
सीमाओं के आसपास भी दबे पाँव मँडराता था
लेकिन हमने धीरे-धीरे उसे सिर-फिरा बना दिया
क्षमादान दे-देकर उसको अपने सिर पर चढा लिया
जिसको हमने छोटा भाई कहकर अपना प्यार दिया
उसने भाई को ही घर में घुसकर चाँटा मार दिया
उसने खुले आम संसद पर आकर हमला बोल दिया
और हमारे भाई-चारे की पोलों को खोल दिया
तो फिर हमको भी उसकी ही सीमा तक बढ जाने दो
अब तो आतंकी अड्डों तक सेना को चढ जाने दो
तुमको फ र्क नहीं पड ता है उनके मरने-जीने पर
जो संगीनें झेल रहे थे अपने नंगे सीने पर
तुम तो रहे सुरक्षित बैठे संसद की दीवारों में
वे रक्षा में खूनी होली खेल गए गलियारों में
तुम तो छिप कर बैठ गए थे संसद के तहखाने में
हमने आठ शेर खोए तब चन्द सियार बचाने में
कब तक दाँतों को पीसेंगे, कब तक मुट्ठी भींचेंगे
कब तक आँखों के पानी से हम पीड़ा को सींचेंगे
रोज यहाँ गाली मिलती है देशभक्त परवानों को
आजादी के योद्धाओं को भारत के दीवानों को
जिनके ओछे क द हैं वे ही अम्बर के मेहमान बने
जो अँधियारों के चारण थे सूरज के प्रतिमान बने
इन लोगों ने भारत का बलिदानी पन्ना फूँक दिया
सावरकर के रिसते घावों पर भी सीधा थूक दिया
जो चीनी हमले के दिन भी ग द्दारी के गायक थे
माओ के बिल्ले लटकाने वाले जो खलनायक थे
जिनके अपराधों की गणना किए ज माने बैठे हैं
वे सावरकर के छालों का मोल लगाने बैठे हैं
ये क्या जानें सावरकर या अण्डमान के पानी को
जो गाली देते रहते हैं झाँसी वाली रानी को
ये ए.सी. कमरों में बैठे सिफ र् जुगाली करते हैं
कॉफी सिगरेट के धुएँ में हफ र् सवाली करते हैं
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